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Reading: ‘सरकार चली गई, मुख्यमंत्री पद गया, इसका अफसोस नहीं है, पर मेरे ही लोग दगाबाज निकले- उद्धव ठाकरे
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‘सरकार चली गई, मुख्यमंत्री पद गया, इसका अफसोस नहीं है, पर मेरे ही लोग दगाबाज निकले- उद्धव ठाकरे

Deepak dubey
Last updated: July 26, 2022 4:23 am
Deepak dubey
Published: July 26, 2022
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शिवसेना और संघर्ष का, एक-दूसरे के साथ गहरा नाता है। शिवसेना, यह एक लहराती तलवार है। इसे यदि म्यान में रखा जाए, तो इसमें जंग लग जाती है। इसलिए यह लहरानी ही चाहिए।

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महाराष्ट्र में विश्वासघाती सत्तांतर के बाद शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने ‘सामना’ को एक तूफानी साक्षात्कार दिया। केवल महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरा देश जिस साक्षात्कार का बेसब्री से इंतजार कर रहा था, उस बेधड़क साक्षात्कार की शुरुआत हो चुकी है। महाराष्ट्र की सरकार क्यों गिराई गई, कैसे  गिराई गई? यहां से लेकर शिवसेना के भविष्य तक के हर प्रश्न का उद्धव ठाकरे ने बेबाकी से जवाब दिया है। उद्धव जी ने अनेक रहस्यों से पर्दा उठाया है। विश्वासघात किए जाने की वेदना उनके मन में है। उन्होंने बेहद व्यथित मन से कहा, ‘सरकार चली गई, मुख्यमंत्री पद गया, इसका अफसोस नहीं है, पर मेरे ही लोग दगाबाज निकले। मेरे ऑपरेशन के बाद की अस्वस्थता के दौरान सरकार गिराने का प्रयास हो रहा था!’
उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट रूप से कहा, ‘शिवसेना कानून की और सड़क की लड़ाई जीतेगी। जिन्होंने विश्वासघात किया है, पार्टी तोड़ी है, वे खुद के पिता का फोटो लगाकर वोट मांगें। शिवसेना के बाप का फोटो लगाकर भीख न मांगें। शिवसेना ने आपको क्या नहीं दिया?
शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने खुलासों और रहस्यों की झड़ी ही लगा दी। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था। लड़ने की जिद थी। उसी माहौल में साक्षात्कार की शुरुआत हुई।

उद्धवजी, जय महाराष्ट्र!
जय महाराष्ट्र! महाराष्ट्र की तमाम मराठी और हिंदू जनता को मेरा जय महाराष्ट्र!

जिन्होंने शिवसेना का संघर्ष देखा है उनका आशीर्वाद हमें बल देगा! उद्धव ठाकरे का दृढ़ विश्वास

उद्धवजी, बाहर इतना तूफान मचा है फिर भी आप इतने ‘रिलैक्स’ दिख रहे हैं? क्या रहस्य है?

(मुस्कुराकर) यह रहस्य ज्यादा पेचीदा नहीं है। आप भी जानते हैं, मेरी मां और शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे से मिला यह रसायन है। मां कहें तो शांतता, सौम्यता, संयम और सहजता है। बालासाहेब कहें तो वर्णन करने की आवश्यकता ही नहीं है। बालासाहेब क्या थे, यह महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरा देश जानता है। थोड़ा-बहुत वह रसायन आया है मुझमें।

हम साल भर बाद विस्तार से बात कर रहे हैं… सही?

मुझे याद है पिछले वर्ष जब आपने मेरा साक्षात्कार लिया था तब कोरोना का कहर जारी था। उस कोरोना में जो कुछ किया जाना संभव था, वह राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर और अभिमान के साथ कहूंगा कि राज्य के कुटुंब प्रमुख होने के नाते मैंने किया। उस समय लॉकडाउन था… मंदिर बंद थे… त्योहारों पर भी पाबंदी थी। लेकिन इस वर्ष पहली बार हमने पंढरपुर की वारी में कोई भी दिक्कत नहीं आने दी और हर्षोल्लास के साथ उसे संपन्न कराया। यानी फिर से एक बार उत्सव-त्योहारों की शुरुआत हो गई है। अब दहीहंडी आएगी, गणपति आएंगे, नवरात्रि आएगी, दिवाली आएगी, फिर एक बार हमारे जीवन में उत्सव, उत्साह और आनंद की शुरुआत हो गई है। बीच के दिनों में जैसे किसी ने एक ‘पॉज’ बटन ही दबा दिया था। आप सभी के सहयोग से हम कोरोना से और उसके संकट से बाहर निकल आए हैं। मुझे आनंद है।

हां निश्चित ही, परंतु आप पर राजनैतिक संकट गहराता दिख रहा है… तूफान है।

आपने साक्षात्कार की शुरुआत में कहा कि एक तूफान आने का आभास हो रहा है। आप ध्यान दीजिए, तूफान कहें तो सूखी पत्तियां-करकट उड़ते ही हैं। वही सूखे पत्ते-करकट इस वक्त उड़ रहे हैं। यह सूखे पत्ते-करकट एक बार जमीन पर आ जाएं तो असली दृश्य लोगों के सामने निश्चित ही आ जाएगा।

लेकिन आप एकदम शांत दिख रहे हैं?

मैं शांत कैसे? तो सच कहूं तो मुझे चिंता मेरी नहीं है, शिवसेना की तो बिल्कुल नहीं है। हां, थोड़ी-बहुत चिंता है, तो निश्चित तौर पर महाराष्ट्र के लोगों की, हिंदुओं और हिंदुत्व की है। इसका कारण, हिंदू द्वेषी और मराठी द्वेषी ये हमारे घर में ही हैं। मराठी लोगों की एकजुटता टूटे, हिंदुओं में फूट  पड़े और मराठी माणुस, हिंदुओं को एकजुट करने के लिए जो मेहनत माननीय शिवसेनाप्रमुख ने जीवन भर की उसे हमारे ही कुछ निकम्मों के हाथों तुड़वाने और फुड़वाने  का प्रयास किया जा रहा है, इसकी मुझे चिंता है। इसलिए मैंने जो कहा कि इस समय जो सूखी पत्तियां-करकट उड़ रहे हैं… उसे उड़ने दो। यहां से पत्ते-करकट वहां जा रहे हैं। जो पत्ते झड़ने जरूरी थे, वे उड़ रहे हैं।

मतलब नए अंकुर फूटेंगे…

मैंने अतीत में अपने मनोगत में कहा था कि… जिस वक्त मैं ‘वर्षा’ में रह रहा था, उस वक्त का अनुभव लिखा था। इस घर के परिसर में दो वृक्ष हैं। एक है गुलमोहर का और दूसरा है बादाम का। दोनों वृक्षों को मैं साधारणत: पिछले एक-दो वर्षों से देख रहा हूं। जिसे हम पतझड़ कहते हैं… पत्तों का गिरना… उसमें पत्ते पूरी तरह से गिर जाते हैं। केवल टहनियां रह जाती हैं। हमें लगता है, अरे इस वृक्ष को क्या हो गया? पर दो-तीन दिन में ही नए अंकुर फूटने लगते हैं, अंकुर फूटते हुए मैंने देखा है, आठ से दस दिनों में वो बादाम का वृक्ष फिर से हरा-भरा हो गया। गुलमोहर भी हरा-भरा हो गया। इसीलिए ये जो सड़े हुए पत्ते होते हैं वे झड़ने ही चाहिए। जो पत्ते झड़ रहे हैं, वे सड़े हुए हैं। उन्हें झड़ जाने दो!

मतलब अब सड़े हुए पत्ते झड़कर गिर रहे हैं।

हां, सड़े हुए पत्ते झड़ रहे हैं। जिन्हें वृक्ष से सब कुछ मिला, सभी रस मिले इसीलिए वे तरोताजा थे। वे पत्ते वृक्ष से सारा कुछ लेने के बाद भी झड़कर गिर रहे हैं और यह देखिए वृक्ष कैसे  उजड़ा-निर्जीव हो गया है ये दिखाने का वे प्रयत्न कर रहे हैं। परंतु अगले ही दिन माली आता है और पतझड़ से गिरे पत्तों को टोकरी में भरकर ले जाता है।

झड़े हुए, सड़े हुए पत्ते कचरे की टोकरी में डालने की प्रक्रिया अब शुरू है?

निश्चित ही यह शुरू हो चुकी है। अब नए अंकुर फूटने लगे हैं। शिवसेना का किशोरों और युवाओं के साथ नाता, शिवसेना के जन्म से ही है। अलबत्ता, अभी भी बड़ी संख्या में वरिष्ठ शिवसैनिक आकर मिल रहे हैं। जिन्होंने बालासाहेब के साथ काम किया है, जिन्हें हम पहली पीढ़ी का कहेंगे। जिन्होंने शिवसेना का संघर्ष देखा है। खुद संघर्ष किया है। उन्हें शिवसेना मतलब क्या है, यह ठीक से पता है। उन्हें शिवसेना से कुछ हासिल करने की अपेक्षा नहीं थी और आज भी नहीं है। परंतु वे आकर आशीर्वाद दे रहे हैं। यही आशीर्वाद शिवसेना को बल देगा।

आपने मलबार हिल स्थित मुख्यमंत्री के सरकारी निवास यानी ‘वर्षा’ का जिक्र किया। मैंने पहले ही कहा था कि आप बहुत रिलैक्स लग रहे हो। परंतु मुझे ऐसा लग रहा है कि मलबार हिल से दोबारा मातोश्री आने के बाद आप ज्यादा रिलैक्स हो गए हो…

क्यों नहीं, मातोश्री मेरा घर है। यहीं ज्यादा रिलैक्स महसूस होता है! मैं आपको अपने कुछ अनुभव सहज ही बताता हूं। जब मेरा ऑपरेशन हुआ… सच कहें तो दो बार ऑपरेशन हुए। वो अनुभव मेरा अलग है। बेहद अजीब अनुभवों से गुजरा हूं मैं। उस वक्त जब अनेस्थेसिया से मुझे जगाया गया…
मुख्यमंत्री रहते हुए…
हां! जब ऑपरेशन हुआ तब मैं मुख्यमंत्री था न।
ऑपरेशन थियेटर से बाहर आने के बाद अनेस्थेसिया से उबरने के बाद मुझे डॉक्टरों ने पूछा कि सर कहां जाएंगे? ‘मातोश्री’ या ‘वर्षा’? मैंने तुरंत कहा- मातोश्री! तब मैने डॉक्टरों से कहा कि डॉक्टर, जब आपने मुझे अनेस्थेसिया दिया था, यदि उस अचेतावस्था में भी आपने मुझसे पूछा होता तो मैंने ‘मातोश्री’ यही जवाब दिया होता।
मतलब, यह कहा जाए कि आपकी ‘मातोश्री’ पर आने की इच्छा नियति ने ही पूरी कर दी?
मूलत: मेरी ‘वर्षा’ पर जाने की इच्छा थी क्या? इसका उत्तर सभी को पता है। इसका अर्थ मुख्यमंत्री पद चला गया इसलिए बुरा कह रहा हूं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। वह एक वैभव है। मुख्यमंत्री पद का और ‘वर्षा’ का मैं बिल्कुल भी अनादर नहीं करूंगा। वह एक अलग ही वैभवशाली वास्तु है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का पद, यह एक वैभवशाली पद है। जिम्मेदारी का पद है। उसका पूरा सम्मान करते हुए कहता हूं, मैंने कभी भी व्यक्तिगत सपने नहीं देखे। उस वक्त जो घटा, वह आज के लोगों को, जिन्हें हम विश्वासघाती कहेंगे, उन्हें वह सब पता है कि कैसे  पीठ पर वार किया गया और किन परिस्थितियों में हमें महाविकास आघाड़ी को जन्म देना पड़ा।
आपके अस्पताल में रहने के दौरान, ऑपरेशन के बाद की अस्वस्थता के वक्त आपकी सरकार को गिराने का प्रयास चल रहा था।

उस मुद्दे पर बोलूं क्या? बहुत पीड़ादायी है वो सब।

शिवसेना की राजनीति हिंदुत्व की मजबूती के लिए ही… उद्धव ठाकरे का स्पष्ट मत

ऐसा आपने कहीं पहले भी कहा है…

मुझे कहीं भी उस अनुभव की सहानुभूति नहीं चाहिए। इसलिए सच कहूं तो मैं इस विषय पर बात करने से बचता हूं, पर वो अनुभव बेहद बुरा था। गर्दन का ऑपरेशन क्या होता है ये किसी भी डॉक्टर से पूछो। उसमें कितने जोखिम होते हैं, उनकी मुझे जानकारी थी। परंतु वह ऑपरेशन करना जरूरी था। मेरा पहला ऑपरेशन हुआ। उस पहले ऑपरेशन से मैं ठीक होकर बाहर निकला। जिसके पांच-सात दिनों बाद डॉक्टर ने मुझसे कहा, उद्धव जी, कल आपको सीढ़ियां चढ़नी हैं। इसलिए मैं उस मानसिक तैयारी में था कि कल मुझे सीढ़ियां चढ़नी हैं। एक-एक कदम आगे बढ़ाने हैं…सुबह उठने के बाद, थोड़ा सुस्ताने के दौरान ही गर्दन में एक ‘क्रैंप’ आ गया और मेरी गर्दन के नीचे की तमाम हलचल ही बंद हो गई। सांस लेते वक्त मैंने देखा कि मेरा पेट भी नहीं हिल रहा था। मैं पूरी तरह से निस्तेज हो गया था। एक ‘ब्लड क्लॉट’ आ गया था। सौभाग्य से डॉक्टर इत्यादि सब वहीं थे। जिसे ‘गोल्डन आवर’ कहते हैं, उस ‘गोल्डन आवर’ में ऑपरेशन हुआ, इसलिए मैं आज यहां आपके सामने बैठा हूं। उस समय मेरे हाथ-पैर भी नहीं हिल रहे थे, उंगलियां भी नहीं हिल रही थीं। सबसे बड़ा टेंशन था कि कोई चींटी काटे, मच्छर काटे तो खुजाएं कैसे… यह भी एक अलग और अजीब समस्या थी। उस समय मेरे कानों तक खबर पहुंच रही थी कि मैं जल्द ठीक हो जाऊं, इसके लिए कुछ लोग अभिषेक कर रहे हैं तो कुछ लोग मैं इसी तरह रहूं, इस चाह में भगवान को हर तरह से मना रहे थे। भगवान को मनानेवाले वे लोग आज पार्टी डुबोने निकले हैं। उस वक्त यह अफवाह फैलाई जा रही थी कि ये अब खड़े ही नहीं हो सकेंगे। अब हमारा क्या होगा? …तुम्हारा क्या होगा? यह चिंता उन्हें थी। जिस समय अपनी पार्टी को संवारने की जरूरत थी। मैं पक्षप्रमुख, कुटुंब प्रमुख हूं, परंतु ऑपरेशन के बाद मैं हिल नहीं पा रहा था, उस दौरान उनकी हरकतें जोर-शोर से चल रही थीं। यह पीड़ादायी सत्य आजीवन मेरे साथ रहेगा। जब मैंने आपको पार्टी संभालने की जिम्मेदारी दी थी, नंबर दो का पद दिया था। पार्टी संभालने के लिए पूरा विश्वास किया था, उस विश्वास का तुमने घात किया। मेरे अस्पताल में रहने के दौरान मेरी हलचल बंद थी। तब तुम्हारे हाल-चाल जोर में थे और वे भी पार्टी के विरोध में।

शिवसेना में विश्वासघात की यह राजनीति बार-बार क्यों होती है?

इसका कारण यही है कि हम इस पार्टी को ‘प्रोफेशनली’ नहीं चलाते, ऐसा मैं कहूंगा। आप भी शिवसैनिक हैं। बीते कई वर्षों से शिवसेना को देख रहे हैं। हम पार्टी को एक परिवार की तरह देखते आए हैं। बालासाहेब ने हमें यही सिखाया है। मां ने भी यही सिखाया है कि अपना कहने के बाद अपना ही। कदाचित राजनीति में यह अपराध अथवा गलती होगी, यह हमसे बार-बार होती है। वह मतलब, किसी पर विश्वास किया तो हम उस पर अंधविश्वास करते हैं। पूरी जिम्मेदारी के साथ उसे ताकत देनी हो… शक्ति देनी हो… हम वो करते हैं, परंतु अभी हमने जिन लोगों पर विश्वास किया, उन्हीं लोगों ने विश्वासघात किया। वे ही अभी ये कहकर अफवाह उड़ा रहे हैं कि हमने हिंदुत्व छोड़ दिया है, शोर मचा रहे हैं। उनसे मुझे यही सवाल पूछना है कि वर्ष २०१४ में भाजपा ने जब युति तोड़ी थी, तब हमने क्या छोड़ा था?… कुछ भी नहीं छोड़ा था। आज भी हमने हिंदुत्व नहीं छोड़ा है। आपको बीच का एक कालखंड याद होगा, जब शिवसेना विपक्ष में बैठी थी, उस समय कई लोगों को लगा था कि शिवसेना अब खत्म हो जाएगी। लेकिन शिवसेना उस समय अकेले लड़ी और ६३ विधायक चुनकर आए। उस दौर में विपक्षी दल की जिम्मेदारी हम पर आई थी, तब मैंने पद किसे दिया था?… भाजपा ने आज जो किया है, वही मुझसे हुई चर्चा के आधार पर उसी समय किया होता तो सब कुछ सम्मानजनक हो गया होता। देशभर में पर्यटन करने की जरूरत नहीं पड़ी होती… और ऐसा मैंने सुना है, ऐसा मैंने पढ़ा है, मेरे पास पक्की जानकारी नहीं है, पर हजारों करो़ड़ रुपए इस पर खर्च किए गए। हवाई जहाजों का खर्च, होटल का खर्च व कुछ और अतिरिक्त खर्च…

अतिरिक्त खर्च… मतलब खोखेवाला?

हो सकता है… उस खोखे के अंदर क्या छिपा है, ये तो वे ही जाने। देने और लेनेवाले को पता चला होगा, लेकिन ये मुफ्त में हो गया होता न… और सम्मान के साथ भी हुआ होता। यही तो मैं कह रहा था।

फिर क्यों किया?

क्योंकि उन्हें शिवसेना को खत्म करना है। जो शिवसेना के साथ तय हुआ था, ढाई-ढाई वर्ष का मुख्यमंत्री पद… वही तो आपने अब किया है और यह यदि उस समय किया होता तो कम-से-कम पांच वर्षों में भारतीय जनता पार्टी को एक बार तो ढाई वर्षों का मुख्यमंत्री पद मिला होता… यह जो कुछ अभी स्वांग रच रहे हैं, ढोंग कर रहे हैं कि हमने शिवसेना को मुख्यमंत्री पद दिया, वो करना नहीं पड़ता और अब वे कह रहे हैं कि ‘हमारी’ शिवसेना यह शिवसेना नहीं है… यह सब तोड़-फोड़ करने के बाद भी उन्हें समाधान नहीं हो रहा क्योंकि उन्हें शिवसेना को खत्म करना है।

शिवसेना को खत्म करना है, ऐसा आपको क्यों लग रहा है… अब तक बीते ५६ वर्षों में शिवसेना को खत्म करने के प्रयास अनेकों ने किए।

अनेक…अनेक… और हर बार शिवसेना अधिक ताकत के साथ और तेजी से उभरी है। अब भी उन्हें हिंदुत्व में अलगाव नहीं चाहिए हो तो मेरा यह हमेशा कहना है कि शिवसेनाप्रमुख ने हिंदुत्व के लिए राजनीति की, वह हिंदुत्व मजबूत होना चाहिए, इसलिए! लेकिन ये राजनीति के लिए हिंदुत्व का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह हमारे और उनके हिंदुत्व में अंतर है। वे पूछते हैं न कि आपके और भाजपा के हिंदुत्व में क्या अंतर है, तो यही अंतर है। शिवसेना की राजनीति, यह हमने हिंदुत्व को मजबूत करने के लिए की है। पर उन्होंने अपनी राजनीति मजबूत करने के लिए हिंदुत्व का इस्तेमाल किया है।

जनता की अदालत में फैसला …  मेरी तैयारी है! उद्धव ठाकरे का दृढ़ प्रतिपादन

आपके महाविकास आघाड़ी का मुख्यमंत्री पद स्वीकारते ही हिंदुत्व खतरे में आ गया, हिंदुत्व संकट में आ गया, ऐसा जो माहौल बनाया जा रहा है…

मतलब क्या?… मुझे कोई तो ऐसी घटना बताओ या मेरे हाथों घटित कोई बात अथवा मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए कोई ऐसा फैसला  बताओ, जिससे हिंदुत्व खतरे में आया हो। एक निर्णय दिखाओ। हाल में भी आप अयोध्या गए थे। अयोध्या में हम महाराष्ट्र भवन बना रहे हैं। सही है? यह हिंदुत्व छोड़कर है क्या? आप ही तय करो। मुख्यमंत्री बनने से पहले मैं अयोध्या गया था। हर बार आप भी थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अयोध्या गया था। कौन क्या कहेगा इसकी मैंने परवाह नहीं की। मैं उस समय भी गया और रामलला के दर्शन लेकर आया था। दो बार मैं खुद अयोध्या गया था। अभी नई मुंबई में हमने तिरुपति मंदिर के लिए जगह दी है। जो प्राचीन मंदिर हैं उनका संवर्धन करना, जीर्णोद्धार करना यह हमने शुरू किया। गढ़-किलों का संवर्धन हमने शुरू किया। इसमें हिंदुत्व गया कहां? हम हिंदुत्व से दूर हों, ऐसा कोई भी निर्णय नहीं लिया गया। ऐसे अनेकों उदाहरण दिए जा सकते हैं।

आप आज जिस संघर्षमय कालखंड से गुजर रहे हैं, उसकी कभी अपेक्षा की थी?

देखिए, आखिर में शिवसेना और संघर्ष एक-दूसरे के पूरक हैं। पहले भी किसी ने कहा था और उसका मुझे बारंबार अनुभव होता है कि शिवसेना, एक लहराती तलवार है। इसे यदि म्यान में रखा जाए, तो इसमें जंग लग जाती है। इसलिए यह लहरानी ही चाहिए। और तलवार लहराना मतलब संघर्ष आ ही गया। अर्थात इसका यह अर्थ कोई न ले कि तलवार से वार करो इत्यादि, ऐसा मेरा कहना भी नहीं है। यह एक उपमा है। अलबत्ता संघर्ष के लिए ही तो शिवसेना का जन्म हुआ है। उस वक्त मराठी माणुस के लिए, भूमिपुत्रों के न्याय व अधिकार के लिए शिवसेना का जन्म हुआ। इसके बाद हिंदुत्व के लिए शिवसेना लड़ी। फिर वो वर्ष ९२-९३ का दौर हो या उसके बाद का कोई भी वक्त। शिवसेना और संघर्ष… जहां अन्याय वहां वार। यह शिवसेना का ब्रीद वाक्य है।

जिस ठाणे ने शिवसेना को पहली ताकत दी… शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे और ठाणे के बीच एक भावनात्मक संबंध था। पहला भगवा झंडा ठाणे में फहराया। बालासाहेब अपने संपूर्ण जीवनकाल में अभिमान से कहते रहे कि ठाणे ने मुझे पहली सत्ता दी। उसी ठाणे से शिवसेना के लिए चुनौती खड़ी हुई है।

ठाणेकर सुधी हैं। ये जो सूखी पत्तियां-करकट हैं, वे मतलब ठाणेकर नहीं हैं। ठाणेकर मतलब ‘शिवसेना का ठाणे और ठाणे की शिवसेना’ यह जो नाता है, वह इन सूखी पत्तियों और करकटों से तोड़ा नहीं जाएगा। इसलिए मैं तो कहूंगा कि पूरा महाराष्ट्र मतलब उसमें ठाणे और मुंबई भी समाविष्ट हैं, वे चुनावों का इंतजार कर रहे हैं। इसलिए मेरा यही मानना है कि उससे पहले ऐसा एक कानून बनना चाहिए कि जिस किसी को भी गठबंधन करना हो, उन दोनों दलों का, तीनों दलों का, दसों दलों का जो कुछ गुणा-गणित आपको करना है वो करें। सिर्फ  आपस में क्या करार-वरार हुआ है, उसे जनता के सामने रखें। सीटों का बंटवारा कैसे  होगा? किस ध्येय से होगा? किस उद्देश्य और नीति पर आप युति कर रहे हैं? आगे क्या करनेवाले हैं वो करें।

इससे क्या साध्य होगा!

मतलब क्या हुआ होता, तो जो मेरे और भारतीय जनता पार्टी के बीच मुख्यमंत्री पद के बारे में तय हुआ था। पहले नकारने के बाद अब उन्होंने वही किया। वह पहले जनता के सामने खुलकर आ गया होता। दूसरी बात, चुनाव के बाद उसकी वजह से मुझे जो कुछ भी करना पड़ा, वह करना नहीं पड़ता। इससे महाविकास आघाड़ी का जन्म ही नहीं हुआ होता। उस महाविकास आघाड़ी को हमने जन्म दिया तब भी आपने देखा होगा कि मैंने जो शपथ ली वह शिवतीर्थ पर ली। छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा और बालासाहेब का स्मारक है वहां। उनकी साक्षी में वह ली।

हजारों-लाखों लोग उस समय मौजूद थे।

शिवतीर्थ पूरी तरह से भगवामय हो गया था, लोगों का हुजूम टूट पड़ा था। लोग नाराज होते तो वहां कोई भी नहीं आया होता। बावजूद इसके मेरी राय यह है कि अभी चुनाव कराएं। यदि हमने महाविकास आघाड़ी बनाकर गलती की होगी तो लोग हमें घर पर बिठा देंगे। आखिर जनता मुझे पहचानती ही है। लगातार हमारी छठी पीढ़ी महाराष्ट्र की जनता के लिए काम कर रही है। उससे पहले की भी पीढ़ियां थीं। भारतीय जनता पार्टी ने हमारे साथ जो करार किया था उसे तोड़ा। इसलिए उनकी गलती के लिए लोग उन्हें घर में बिठाएंगे या हमने पाप किया होगा तो हमें घर बिठाएंगे। हो जाने दीजिए जनता की अदालत में फैसला …मेरी तैयारी है।
परंतु इस पूरे कालखंड में कभी न घटनेवाले अवांछित प्रकार हो रहे हैं। ऐसा महाराष्ट्र में कभी नहीं हुआ था। वह मतलब, कोई तो संपूर्ण शिवसेना को हाईजैक करने की कोशिश कर रहा है।
क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। इसका कारण ठीक से समझिए, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। जो कुछ भी थोड़ा-बहुत कानूनी ज्ञान, मैंने लोगों और कानूनी विशेषज्ञों से बातचीत में समझने का प्रयास किया है, उस आधार पर कह रहा हूं कि पहले सदस्यों की दो तिहाई संख्या होने पर अलग गट स्थापित करना संभव था। अब वह कानून रद्द हो गया है। अब यह जो लोग बगल हो गए हैं, वे भले ही दो तिहाई होंगे अथवा और कुछ भी होंगे, वे अलग गट स्थापित नहीं कर सकते हैं। यह कानूनी विशेषज्ञों का कहना है। मैंने कानून लिखा नहीं है, मैंने कानून पढ़ा नहीं है। संविधान के विशेषज्ञों ने, जिन्होंने इसका अध्ययन किया है उनके विश्लेषण के आधार पर और उनसे बात करके कह रहा हूं। मतलब यह है कि इस गट को किसी-न-किसी पार्टी में विलीन या समाविष्ट होना पड़ेगा। फिर उनके सामने विकल्प क्या है? या तो भाजपा में जाना पड़ेगा, नहीं तो सपा, एमआईएम इत्यादि जैसे छोटे-छोटे दल हैं उनके पास जाना पड़ेगा। और ये यदि किसी पार्टी में गए तो भारतीय जनता पार्टी को इनका जो इस्तेमाल करना है वह उपयोग समाप्त हो जाएगा। क्योंकि उन्हें उनकी पहचान वही बतानी होगी कि अब हम भाजपा में गए हैं, अब हम समाजवादी पार्टी में गए हैं, अब हम बच्चू कडू के पक्ष में गए हैं। इसीलिए ये भ्रम निर्माण कर रहे हैं कि हम ही हैं शिवसेना। बीच के समय में एक क्लिप वायरल हुई, देखिए… वास्तव में तो ऐसा मेरे समय में कभी हुआ नहीं था। मेरे बगल में अजीतदादा पवार बैठते थे, लेकिन उन्होंने कभी मेरा माइक नहीं खींचा था। कई बार उनके पास बजट इत्यादि को लेकर अधिक जानकारी होती थी, उस समय मैं उनसे कहता था कि दादा आप जवाब दो। मुझसे किसी ने माइक नहीं खींचा।

क्योंकि आप ठाकरे हैं…

वो तो एक भाग है। लेकिन एक, हमारी महाविकास आघाड़ी में सभ्यता थी, समन्वय था। ठीक है। उस पर बोलना होगा, तब मैं बोलूंगा। उनके उपमुख्यमंत्री ने कहा कि उनके साथ जो लोग हैं वही शिवसेना। मतलब उनका षड्यंत्र यह है कि शिवसैनिकों को आपस में लड़ाओ, शिवसेना को खत्म करो और एक बार ही सही, शिवसेना खत्म हुई कि सूखी पत्तियां और करकट आप जो कह रहे हैं वह टोकरी में भरो और ले जाकर फेंक दो।
बालासाहेब ठाकरे के बाद भी शिवसेना खत्म करने की उनकी योजना थी। यही उनका सपना था। परंतु बालासाहेब के बाद आपने शिवसेना को खड़ा किया।
उनके पेट में वही दर्द है। उन्हें शिवसेना और ठाकरे को अलग करना है।

जैसे गांधी और कांग्रेस को अलग करना था…

अलग करना था। हां, सच ही है। मुझे केवल आलोचनात्मक बोलना है, इसलिए मैं नहीं बोल रहा। लेकिन अब सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष बाबू, वैसे ही बालासाहेब। ये खुद ही के बताकर लोगों के सामने लाने का प्रयत्न कर रहे हैं। मतलब हमसे कोई आदर्श निर्माण नहीं हो सका तो, जैसे दूसरों की पार्टी तोड़ रहे हैं, वैसे आदर्श तोड़ो।

आदर्श चुराओ विधायकों की तरह…?

फोड़ना कहो या चुराना कहो…और वे अपने ही हैं, ऐसा कहकर जनता के सामने जाओ। इनका यही चल रहा है। बालासाहेब ठाकरे को मान-सम्मान देना ही पड़ेगा, नहीं तो लोग इन्हें जूतों से मारेंगे। लोग उन्हें जगह पर नहीं रहने देंगे। कोई भी हो और वो बालासाहेब ठाकरे के विरोध में कुछ भी बोला तो लोग तुरंत जूता उसके… इसीलिए उन्हें बालासाहेब ठाकरे चाहिए। लेकिन अब ठाकरे और शिवसेना, यह नाता तोड़ना है।

वे बालासाहेब पर हक जता रहे हैं?

मेरा उनसे आह्वान है कि ठाकरे और शिवसेना का नाता तोड़कर दिखाएं। और ऐसा करते वक्त मेरे पिता के फोटो लगाकर वोट न मांगें। सभी के माता-पिता होते हैं, मुझे मेरे माता-पिता के प्रति आदर है, वैसा ही हरएक को अपने माता-पिता के प्रति आदर होना चाहिए। पिछले सप्ताह गुरुपूर्णिमा थी। मैं अपने पिता और दादा जी को गुरु मानता हूं, सभी को ‘मातृदेवो भव पितृदेवो भव’ ऐसा देव मानना चाहिए। खुद के माता-पिता का फोटो लगाकर जनता से वोट मांगना चाहिए। आज मेरा दुर्भाग्य है कि मेरे माता-पिता मेरे साथ नहीं हैं पर वे मुझमें हैं, ऐसा मैं मानता हूं। पर जिनके माता-पिता सौभाग्य से उसके साथ हैं उन्हें अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर काम करना चाहिए, मैं तो कहूंगा कि ऐसा आशीर्वाद दूसरा नहीं दे सकता। उन्हें लेकर भी सभा करें, भाषण दें और जनता से वोट मांगे, मेरे पिता को क्यों चुरा रहे हैं? मतलब क्या तुम में कर्तृत्व नहीं है, तुम्हारे में हिम्मत नहीं है, तुम मर्द नहीं हो। तुम विश्वासघाती हो। और मेरे साथ तुमने विश्वासघात किया ही। लोगों के साथ विश्वासघात करते हुए बालासाहेब के प्रति भ्रम क्यों पैदा कर रहे हो? तुम खुद को मर्द वगैरह समझते हो ना? तो तुम्हारा मर्दाना चेहरा लो और जाओ आगे, वोट मांगो।

मैंने इन्हें अपने परिवार का सदस्य समझा यह मेरा अंधविश्वास था! उद्धव ठाकरे की पीड़ा

चुनाव आयोग में अब एक नया मामला खड़ा हो रहा है कि धनुष-बाण किसका? लोगों तक जो शिवसेना का चिह्न पहुंचा है…

मेरा अब भी देश के संविधान पर भरोसा है। कानून पर भरोसा है। चोरी-चकारी सब जगह चलती है, ऐसा मेरा बिल्कुल भी मानना नहीं है। मैं मानता हूं ‘सत्यमेव जयते’ है… नहीं तो यह वाक्य तुम्हें बदलना पड़ेगा और फिर एक ही वाक्य को दो वाक्य में बदलना पड़ेगा। एक तो ‘असत्यमेव जयते’ और दूसरा ‘सत्तामेव जयते’। इसलिए सत्तामेव जयते के सामने आप असत्य लेकर कुछ करनेवाले हो तो जनता इसे बर्दाश्त नहीं करेगी।

ठाकरे की शिवसेना सही या गलत, इसके सबूत देने पड़ रहे हैं आज ऐसा वक्त आ गया है। यह महाराष्ट्र का दुर्भाग्य है।

लोग चुनाव का इंतजार कर रहे हैं। हमें सबूत देने की जरूरत नहीं है, लोग कह रहे हैं कि चुनाव आने दो, हम उन्हें ही गाड़ देंगे।

…मतलब जनता ही सबूत देगी?

जनता ही इन्हें राजनीति से मिटा देगी।

आज जो शिवसेना में फूट  दिख रही है इस प्रकार की फूट  राणे, भुजबल भी नहीं कर पाए थे। ऐसा क्यों हुआ?

इसका कारण ऐसा है कि जिसे मैंने अधिकार दिया था, उसी ने मुझसे विश्वासघात किया। उस समय लोग मेरे मुंह पर नहीं बोल रहे थे लेकिन मुझे इसकी सुगबुगाहट सुनाई दे रही थी। ये कैसे  मुख्यमंत्री हैं… नगर विकास विभाग मुख्यमंत्री के पास होना चाहिए, कहा जा रहा था मलाईदार विभाग है। लेकिन मैंने वह विभाग अपने पास न रखते हुए विश्वास करके उन्हें सौंप दिया था। मैं वहां मलाई-वलाई खाने के लिए नहीं गया था, मैंने मेरे पास जो विभाग रखे थे उनमें एक सामान्य प्रशासन, दूसरा न्याय व विधि और हां, आईटी विभाग भी था। क्योंकि वास्तव में इस तकनीकी का उपयोग सभी के विभागों के लिए कुछ-न-कुछ करने में मददगार होगा, ऐसा मेरा विचार था।

जैसी राजीव गांधी ने एक क्रांति की थी…

हां, वैसा ही एक विचार था और उसके बाद एक मंत्री के कारण उनका विभाग कुछ दिनों तक मेरे पास था।

निश्चित कहां गलती हुई, क्या लगता है?

गलती मेरी है और वह मेरे पहले ही फेसबुक लाइव में मैंने कबूल की है। अपराध मेरा है। वो यह कि मैंने उन लोगों को परिवार का समझकर उन पर अंधविश्वास किया।

मुख्यमंत्री बनना आपकी चूक थी?

दो बातें हैं, मान लो यदि मैंने उस समय उन्हें मुख्यमंत्री बनाया होता तो उन्होंने आज और कुछ अलग ही किया होता। क्योंकि उनकी भूख मिटती ही नहीं है। मुख्यमंत्री पद भी चाहिए और अब शिवसेनाप्रमुख भी बनना है? शिवसेनाप्रमुख के साथ तुलना करने लगे हैं? यह राक्षसी महत्वाकांक्षा है। इसे दानवी प्रवृति कहते हैं। मतलब ऐसा है कि जो दिया वो मेरा तो मेरा, और जो तुम्हारा है वह भी मेरा, यहां तक तो था। अब इसका वो भी मेरा और उसका वो भी मेरा। यहां तक उनकी हवस पहुंच गई है। ऐसी लोभी प्रवृत्ति की कोई सीमा नहीं होती।

या महाविकास आघाड़ी का प्रयोग एक चूक थी?

महाविकास आघाड़ी का प्रयोग अगर चूक होता तो लोगों ने विरोध किया होता, जनता ने विरोध किया होता लेकिन ऐसा हुआ नहीं, जनता आनंदित थी। क्योंकि सरकार बनते ही हमने किसानों को कर्जमुक्त कर दिया। उसके बाद, मैं अभिमान के साथ कहूंगा कि कोरोना काल में मेरे मंत्रिमंडल के सभी सहयोगियों, प्रशासन और जनता ने उत्तम सहकार्य किया। केवल इसी और इसी वजह से देश के उन ५ टॉप मुख्यमंत्रियों में मेरा नाम आया। मैं मेरा नाम नहीं कह रहा पर जनता के प्रतिनिधि के तौर पर मेरा नाम आया था। यदि सभी का सहयोग नहीं होता तो मैं कौन था? मैं अकेले क्या कर सकता था? ठीक है, मैं खुद भी घर से बाहर नहीं निकल रहा था क्योंकि मैं खुद लोगों को कह रहा था कि घर से बाहर मत निकलो।

फूटकर गए लोगों का आरोप भी इसी पर है। जो टूटकर गए हैं उनका आरोप है कि आप घर के बाहर निकले नहीं, आप मंत्रालय नहीं गए, आपने उनसे मुलाकात नहीं की।

…एक मिनट …घर के बाहर ना जाते हुए भी देश के सर्वोत्तम ५ मुख्यमंत्रियों में मेरा नाम क्यों आया? क्योंकि उस वक्त परिस्थिति ही वैसी थी। मैं खुद लोगों से कह रहा था कि घर के बाहर ना निकले, और लोग उसे मान रहे थे। मैं अगर उस समय घर से बाहर निकला होता या आज भी निकलूं तो शिवसेनाप्रमुख के आशीर्वाद से, मेरे पूर्वजों के आशीर्वाद से भीड़ होती ही है। मतलब उस समय क्या हुआ होता। एक कहावत है लोगों को बताएं, ब्रह्मज्ञान और खुद कोरा पाषाण।

मतलब वो समय की जरूरत थी?

…बिल्कुल समय की जरूरत थी… लेकिन मैं फिर एक बार कह रहा हूं कि शुरुआती दौर में कोरोना वायरस का हमारे बीच प्रसार हुआ जब तक हमें यह पता चला, तब तक साधारण रूप से साढ़े सात हजार से आठ हजार तक मरीजों की संख्या राज्य में हो गई थी। उसके बाद मरीजों के लिए ऑक्सीजन बेड आए, वेंटिलेटर आया, कॉमन मरीज थे, जिन्हें थोड़ा ट्रीटमेंट देकर घर भेजा जा सकता था, ऑपरेशन के बाद कुछ मरीज थे, डायलिसिस वाले मरीज थे, कोरोना की पहली लहर में साधारणत: ८ हजार मरीज थे, जो बढ़कर ३.५० लाख तक पहुंच गए। वो भी घर बैठे? हॉस्पिटल में तो बेड्स नहीं थे, एंबुलेंस नहीं थीं, किसने कैसे  व्यवस्था की उसकी? कोरोना के टेस्ट के लिए अपने राज्य में सिर्फ  दो प्रयोगशालाएं थीं, एक कस्तूरबा में और एक एनआईवीएम पुणे में। बाद में साढ़े छ: सौ से अधिक प्रयोगशालाएं हमने शुरू कीं। वह घर बैठे?

उस विषय पर ५० विधायकों ने तारीफ नहीं की, उन्हें आपने निधि नहीं दी, ऐसा वे बोल रहे हैं

और आपने हिंदुत्व छोड़ दिया ऐसा उनका कहना है। इसलिए वे छोड़कर चले गए। आपने महाराष्ट्र के लिए जो कुछ किया है… कोरोना के संकट से राज्य को बचाया, लोगों को जीवनदान दिया है। महाराष्ट्र की नदियों में आपने शवों को बहने नहीं दिया।
इसी की उन्हें पीड़ा होगी कि ऐसा नहीं हुआ, यह गलत हुआ है, ऐसा उनका मानना होगा।

महाराष्ट्र की जनता को यह मुख्यमंत्री अपने परिवार का सदस्य लगता था। अपने परिवार का भाई, बेटा…

इसीलिए तो इन विश्वासघातियों को मेरे बारे में क्या लगता है, इसकी मुझे चिंता नहीं है। मेरे महाराष्ट्र की जनता को मैं उनके परिवार का लगता हूं। ऐसा सौभाग्य किंचित लोगों के नसीब में आता है। मुझे नहीं लगता वह उनके नसीब में आया होगा। क्योंकि उन्हें कुछ पद अब मिले हैं फिर भी ‘हम तुम दोनों एक कमरे में बंद हों’ ऐसा उनका मंत्रिमंडल है। उसका विस्तार कब होगा, पता नहीं। लेकिन वे कितने भी मंत्री-वंत्री हो जाएं लेकिन उनके माथे पर लगी विश्वासघात की मुहर कभी पोंछी नहीं जा सकती।

आपको ऐसा नहीं लगता कि जो आपको छोड़कर गए हैं उन्हीं को आपने सबसे ज्यादा दिया है।
दिया ही है… उन्हें भरपूर दिया है!और जिन्हें कुछ नहीं मिला या जिन्हें कम मिला, वे आपके साथ रहे।

मुझे यही कहना है कि यही शिवसेना की ताकत है। बालासाहेब ने सामान्य व्यक्ति को असामान्य बना दिया, यही शिवसेना की ताकत है। अब फिर एक बार सामान्य से, असामान्य हस्तियां बनाने का समय आ गया है। इसीलिए मैं अपने समस्त शिवसैनिकों से, माताओं-बहनों से और भाइयों से विनती करता हूं कि चलो, फिर से उठो… अब फिर एक बार सामान्य को असामान्य बनाएं… क्योंकि ये साधारण लोग थे और मैं फिर कहूंगा कि यह मेरी गलती है कि मैंने उन्हें ताकत दी। लेकिन उस ताकत से उन्होंने न केवल उलट हमला किया, बल्कि राजनीति में जिस मां ने जन्म दिया, उस मां को ही निगलने निकली यह औलाद है। केवल मां पर वार करनेवाले, ऐसा हम कह रहे थे लेकिन सिर्फ  उतना नहीं है। राजनीति में जिसने इनको जन्म दिया, उस मां को, मतलब शिवसेना को निगलने के लिए निकली यह औलाद है। पर इतनी ताकत उनमें है नहीं… क्योंकि मां आखिर मां होती है।

जरूर… आपने मां का उल्लेख किया। कल तक सब लोग शिवसेना को अपनी मां मानते थे। आखिरी क्षण तक आपके साथ वर्षा पर मैंने अनेक लोगों को बैठे देखा है।हां… लेकिन अभी आपका पिछला प्रश्न क्या था? कि मैं उनसे मिलता नहीं था।
हां… और आपसे मिलकर कुछ लोग सूरत गए… कोई गोवा गया… कोई गुवाहाटी गया… ५० खोखे की इतनी ताकत हो सकती हैं? निष्ठा खरीदी जा सकती है?
निष्ठा बेची नहीं जाती। और जो बेची जाती है वो निष्ठा नहीं होती।

महबूबा के साथ क्यों गए थे? वो आज भी ‘वंदे मातरम’ कहती हैं क्या? उद्धव ठाकरे का सख्त सवाल

महाराष्ट्र में भी पेड़ हैं, पहाड़ हैं, होटल हैं… महाराष्ट्र तो बहुत ही सुंदर है?

कितना सुंदर है महाराष्ट्र… ग्रामीण क्षेत्रों के विधायकों को महाराष्ट्र का यह निसर्ग आकर्षित नहीं करता पर गुवाहाटी का निसर्ग आकर्षित करता है। यह बात मुझे समझ नहीं आती। फिर आप महाराष्ट्र की मिट्टी में जन्मे कैसे ? जिस महाराष्ट्र की मिट्टी में आप जन्मे, उस मिट्टी से आपको लगाव नहीं है, प्रेम नहीं है। उस मिट्टी का वैभव नजर नहीं आया… मैं खुद एक कलाकार हूं, इसकी भी कई बार चेष्टा हुई पर मैंने गढ़-किलों की फोटोग्राफी की, पंढरपुर की वारी भी की… उस वक्त मैंने जो महाराष्ट्र देखा, उस समय बारिश के दौरान मैंने ये सारी फोटोग्राफी की। कितना भव्य, कितना सुंदर है महाराष्ट्र, पहाड़ों-घाटों में फूलों  की छटा देखते ही बनती है… मैं तो शहरी बाबू हूं। आप तो ग्रामीण क्षेत्र से हैं। उस ग्रामीण महाराष्ट्र में रहकर भी आपको वहां का सौंदर्य दिखाई नहीं देता। उसका वर्णन करने का कभी मन नहीं किया और डायरेक्ट गुवाहाटी? मैं गुवाहाटी की आलोचना नहीं कर रहा। हर एक प्रदेश अच्छा ही होता है। खैर, ये लोग अपनी मिट्टी के लिए क्या करेंगे?

इतिहास गवाह है कि दिल्ली और महाराष्ट्र में हमेशा झगड़ा रहा है। फिर औरंगजेब हो, छत्रपति शिवाजी महाराज हों, संभाजी महाराज हों। दिल्ली ने हमेशा महाराष्ट्र की पीठ पर वार किया या महाराष्ट्र को खत्म करने का प्रयत्न किया।
इसका कारण क्या है?

…आज भी वही चित्र है। आज भी शिवसेना से प्रतिशोध लेने के लिए बालासाहेब ठाकरे के अस्तित्व में ही सेंध लगाई जा रही है।
मान्य है… पर इसकी जड़ तक जाने की जरूरत है क्योंकि जब तक वे दिल्ली गए नहीं थे, तब तक बालासाहेब ठाकरे ही उनको संबल दे रहे थे। बालासाहेब ही इनको बचाते थे और बचाया भी था। सिर्फ  हिंदुत्व के जुनून में, मोह में… पर दिल्ली में बैठने के बाद दिल्ली की उस कुर्सी को कोई अलग ही तरह का स्प्रे मारा है कि आपको जिसने संबल दिया, उन्हीं को आप खत्म करने निकले हो। जिस शिवसेना ने और शिवसेनाप्रमुख ने बाबरी विध्वंस की जिम्मेदारी ली थी, उसी शिवसेना को आप ‘हिंदुत्व छोड़ दिया’, ऐसा कहकर खत्म करने निकले हो? ठीक है, हम कांग्रेस के साथ गए, इसलिए आप कहते हो कि हमने हिंदुत्व छोड़ दिया, फिर मुफ्ती मोहम्मद और महबूबा मुफ्ती के साथ आप क्यों गए, वो क्या था? आपने क्या छोड़ा था? अब आपको लगता है कि हमने हिंदुत्व छोड़ दिया, जो हमने छोड़ा ही नहीं है। तो फिर तब आपने लाज छोड़ी ही थी ना? वो महबूबा मुफ्ती आज भी ‘वंदे मातरम’ कहती हैं क्या? या `भारत माता की जय’ बोलती हैं? मुझसे एक बार उन्होंने कहा था कि वहां चुनाव कराकर देखो, ऐसी चुनौती आतंकवादियों ने दी है। इसलिए हमने चुनाव करवाकर दिखाए। सरकार बनाकर दिखाई… तो इस कारण हमने उनके साथ सरकार बनाई। हालांकि सरकार बनने के बाद कश्मीर घाटी में शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव संपन्न होने देने के लिए मुफ्ती मोहम्मद सईद ने आतंकवादियों और पाकिस्तान को धन्यवाद दिया था। फिर आपने किसको क्या दिखाया… ठीक है, आज भी जो बिहार में नीतीश कुमार के साथ बैठे हैं… नीतीश कुमार हिंदुत्ववादी हैं क्या? क्योंकि मुझे जो याद आ रहा है उस आधार पर उन्होंने एक बार `संघमुक्त भारत’ का नारा दिया था। संघमुक्त भारत… ऐसा नारा शिवसेना ने कभी नहीं दिया।

राम मंदिर के मुद्दे पर रामविलास पासवान एनडीए से बाहर निकल गए थे।

फिर भी वे उनको प्यारे थे… हम तो उल्टे कह रहे थे कि विशेष कानून बनाओ… पांच वर्ष, सात वर्ष बीत गए, फिर भी वे विशेष कानून बनाकर राम मंदिर नहीं बना सके। अंत में न्यायालय ने फैसला दिया।

इस देश के समस्त विपक्षी दलों और क्षेत्रीय दलों को समाप्त किया जा रहा है…

और मित्र पक्षों को भी…

हां, मित्र पक्षों को भी… यहां आपको कोई षड्यंत्र दिखाई देता है क्या? या बदले की राजनीति…

मुझे लगता है यह अपना-अपना सवाल है, जो बीच में मुख्य न्यायाधीश ने कहा था… मैंने पिछले दिनों पढ़ा था, कि अपने देश के विरोधी दलों को अपना शत्रु मत समझिए। विरोधी दलों को भी जिम्मेदारी से काम करना चाहिए और सत्ताधारी दल को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए… मैंने मुख्यमंत्री के तौर पर ढाई वर्षों में जो कुछ भी अनुभव किया, मैंने विपक्षी दलों से भी कई बार आवाहन किया… आह्वान नहीं आवाहन किया कि सरकार के रूप में, अगर हम कहीं कमजोर पड़ रहे हों, हमसे कोई चूक हो रही हो तो आप हमारी नजरों में लाओ। यह काम विपक्ष का है। कारण वे भी जनप्रतिनिधि ही हैं, इसलिए मजबूत लोकतंत्र के लिए…
और महाराष्ट्र की परंपरा भी है वो…
विरोधी पक्ष भी उतना ही सुसंस्कृत होना चाहिए, संवेदनशील चाहिए और उतना ही, बल्कि उससे भी अधिक सत्ताधारी पक्ष संवेदनशील और सुसंस्कृत होना चाहिए। आज संवेदनशीलता और सुसंस्कृत परंपरा रसातल में समाती जा रही है।

किसलिए?

पीढ़ियां बदल रही हैं और उस पर सत्ता लोलुपता… अब क्या हो रहा है, फास्ट फूड  का जमाना आ गया है, आपने फोन किया कि दस मिनट में, पंद्रह मिनट में या बीस मिनट में पार्सल आ ही जाना चाहिए, वैसे ही मैं पार्टी में आया कि कुछ ही दिनों में मुझे कुछ तो मिलना ही चाहिए। नहीं तो मेरे पास दूसरा तैयार ही है।

इस देश में विपक्ष रहे ही नहीं। फिर राज्य में शिवसेना जैसी क्षेत्रीय पार्टी हो या राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस जैसी पार्टी, उन्हें खत्म करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद…
इससे क्या हासिल होना है?मतलब केंद्रीय  जांच एजेंसियां… ईडी हो, सीबीआई हो…

मैं वही कह रहा हूं, इससे क्या हासिल होगा?

उनका जो दुरुपयोग चल रहा है…

आखिर जनता ही सार्वभौम है और आपने देखा होगा कि जनता के मन के विपरीत कोई निर्णय गया तो जनता थमती नहीं है। वह सड़कों पर उतरती है।
(क्रमश:)

(सौजन्य -सामना)

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