नया साल शुरू होने से पहले ही भारतीय रेलवे (Indian Railway)
काग़ज़ों पर किराया महज दो पैसे प्रति किलोमीटर बढ़ाया गया है, लेकिन जब यात्रा सैकड़ों या हज़ारों किलोमीटर की हो, तो यही दो पैसे यात्रियों पर भारी पड़ते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब रेलवे सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक यात्रा देने में लगातार नाकाम साबित हो रहा है, तो किराया बढ़ाने का नैतिक अधिकार उसे किसने दिया?
सुविधाएँ गायब, किराया बेहिसाब
बीते कुछ महीनों में रेलवे की बदहाली (Indian Railway Passenger News) देश ने खुली आंखों से देखी है। ट्रेनों की भारी कमी, त्योहारों के दौरान बेकाबू भीड़, कोचों में गंदगी, दलालों का बोलबाला और सुरक्षा में घोर लापरवाही—यही आज भारतीय रेलवे की पहचान बनती जा रही है।
त्योहारों के दौरान हालात इतने बदतर रहे कि यात्रियों को शौचालयों में बैठकर सफर करने पर मजबूर होना पड़ा। कई मामलों में जान तक गंवानी पड़ी। रोज़ाना सुरक्षा में चूक की खबरें सामने आती रहीं, लेकिन सुधार के बजाय रेलवे ने यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना ही सबसे आसान रास्ता चुन लिया।
जनता पूछ रही है तीखे सवाल
- बिना टिकट यात्रा करने वालों से करोड़ों रुपये का जुर्माना वसूला जा रहा है, लेकिन यह पैसा आखिर जा कहां रहा है
- जब यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, तो ट्रेनों और कोचों की संख्या क्यों नहीं बढ़ाई जा रही?
- क्या हर समस्या का समाधान सिर्फ किराया बढ़ाना ही है?
- क्या भारतीय नागरिकों की जान, समय और परेशानी की कोई कीमत नहीं?
नई किराया व्यवस्था क्या कहती है
रेलवे के अनुसार 26 दिसंबर 2025 से लागू नई व्यवस्था के तहत—
- उपनगरीय ट्रेनों और मासिक सीजन टिकट (MST) के किराए में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।
- साधारण श्रेणी में 215 किलोमीटर तक किराया यथावत रहेगा।
- 215 किलोमीटर से अधिक दूरी पर साधारण श्रेणी में 1 पैसा प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी होगी।
- मेल/एक्सप्रेस (नॉन-एसी) और एसी श्रेणी में 2 पैसे प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी की गई है।
रेलवे का दावा है कि नॉन-एसी कोच में 500 किलोमीटर की यात्रा पर यात्रियों को केवल 10 रुपये अतिरिक्त देने होंगे और इस फैसले से करीब 600 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी।
दावे बड़े, ज़मीनी हकीकत उलटी
रेलवे नेटवर्क विस्तार, सुरक्षा सुधार और बढ़ती संचालन लागत का हवाला दे रहा है। मानव संसाधन पर 1.15 लाख करोड़ रुपये, पेंशन पर 60 हजार करोड़ रुपये और कुल संचालन लागत 2.63 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है।
लेकिन आम यात्रियों के लिए सच्चाई कुछ और ही है। ज़मीन पर न सुरक्षा दिखती है, न सुविधाओं में सुधार। दिखाई देते हैं तो सिर्फ आंकड़े, दावे और हर साल महंगा होता रेल सफर।
सवाल साफ है—
जब सुविधाएँ न के बराबर हों और सुरक्षा लगातार सवालों के घेरे में हो,
तो किराया बढ़ाने का बोझ सिर्फ जनता ही क्यों उठाए?



