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should the SRA scheme be closed? बिल्डरों द्वारा धोखाधड़ी की जाती , आम लोगों के हितों की रक्षा नहीं की जाती, क्या एसआरए योजना बंद कर देनी चाहिए?

dharavi 2016627 151115 27 06 2016

मुंबई । मुंबई शहर और उपनगरों में सैकड़ों झोपड़पट्टी पुनर्वास परियोजनाओं पर खतरा बढ़ गया है। (should the SRA scheme be closed?) झोपड़पट्टी पुनर्वास योजना में बिल्डरों द्वारा की गई घोर धोखाधड़ी को गंभीरता से लेते हुए उच्च न्यायालय ने मिंधे सरकार की निष्क्रियता की आलोचना की। बिल्डर्स एसआरए स्कीम का फायदा उठाते हैं और आम आदमी को धोखा देते हैं। ऐसे में अगर सरकार आम आदमी के हितों की रक्षा नहीं कर रही है, तो एसआरए योजना को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए, ऐसा तीखा सवाल कोर्ट ने मिंधे सरकार से पूछा। इसलिए एसआरए का भविष्य संकट में पड़ गया है।

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पूर्वी उपनगर में विकासक साईनाथ कॉर्पोरेशन भांडुप, घाटकोपर और कुर्ला में आठ पुनर्विकास/झोपड़पट्टी पुनर्वास परियोजनाओं में गैर व्यवहार का मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। एसआरए योजना के तहत मकान निजी बाजार में बेच दिए गए और मूल लाभार्थी निवासियों को विस्थापित कर दिया गया। संबंधित परियोजनाओं में धोखा खाने वाले कई निवासियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है और रिट याचिकाएं दायर की हैं। उन याचिकाओं पर न्यायमूर्ति गौतम पटेल और न्यायमूर्ति कमल खट्टा की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई।

धारावी पुनर्वास प्रोजेक्ट खटाई में पड़ने की आशंका

उच्च न्यायालय की इस गंभीर भूमिका के कारण मुंबई शहर के पूर्वी और पश्चिमी उपनगरों में बड़े पैमाने पर किये जा रहे धारावी जैसी प्रस्तावित झोपड़ा पुनर्वास परियोजना के भी खटाई में पड़ने की आशंका है। बिल्डरों द्वारा धोखाधड़ी के संकेत और उन पर अंकुश लगाने के बजाय बिल्डरों का समर्थन करने के तरीके भी न्यायालय के रडार पर आने के संकेत हैं।

सरकार चुप रहने के कारण लोगों को कोर्ट आना पड़ता

एसआरए योजना में बिल्डरों द्वारा नियम-कायदों का उल्लंघन कर आम लोगों को चूना लगाया जाता है। ऐसे में सरकार कैसे चुप रह सकती है? आम लोगों को सरकारी अदालत से न्याय नहीं मिलता, इसलिए उन्हें अदालत की सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। ऐसे में अगर सरकार आम आदमी के हितों की रक्षा नहीं कर सकती तो एसआरए अथॉरिटी का क्या फायदा? क्या इस प्राधिकरण और योजना को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए? बेंच ने यह नाराजगी भरा सवाल मिंधे सरकार से पूछा है ।

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