BJP Forgets Its Principles: परिवारवाद के खिलाफ मुखर रहने वाली भारतीय जनता पार्टी पर अब उसी बीमारी के आरोप लग रहे हैं, जिसके लिए वह वर्षों से अन्य दलों को घेरती रही है। राज्य में शुरू हुए स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के चुनावों ने भाजपा के दावों की पोल खोल दी है। आरोप है कि इन चुनावों में सामने आए कुल परिवारवाद के मामलों में लगभग 50 प्रतिशत उम्मीदवार भाजपा से जुड़े हुए हैं। यही तस्वीर आगामी मुंबई महानगरपालिका सहित अन्य मनपा चुनावों में भी उभरती नजर आ रही है।
मुंबई मनपा चुनाव को लेकर भाजपा में टिकट (Nominated Family Members BJP) के लिए जबरदस्त खींचतान शुरू हो चुकी है। कई वरिष्ठ नेता अपने बेटे, बेटी, पत्नी, भाई या अन्य रिश्तेदारों के लिए टिकट सुनिश्चित कराने में जुटे हैं। इसके लिए जोरदार लॉबिंग की जा रही है। वहीं, वर्षों से पार्टी के लिए जमीन पर काम करने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं में नाराज़गी साफ दिख रही है, लेकिन प्रभावशाली नेताओं के सामने उनकी आवाज दबती नजर आ रही है।
120 सीटों में 60 परिवारों को?
शिंदे गुट के साथ गठबंधन के बाद मुंबई भाजपा को करीब 120 सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि इनमें से लगभग 60 सीटों पर नेताओं के परिजनों को टिकट दिए जा सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह भाजपा के “पार्टी विद द डिफरेंस” के दावे पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा।
परिवार के लिए टिकट की कतार
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा के कई बड़े नाम अपने परिजनों के लिए टिकट की मांग कर रहे हैं। इनमें विधायक, पूर्व मंत्री, सांसद, संगठन पदाधिकारी और वरिष्ठ नेता शामिल हैं। बेटा-बेटी, पत्नी, भाई, बहन, बहू तक को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी है। सूची लंबी है और लगभग हर क्षेत्र में किसी न किसी नेता के परिवारजन का नाम चर्चा में है।
कार्यकर्ताओं में असंतोष
पार्टी के भीतर ही कई पदाधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं ने नेतृत्व से साफ कहा है कि यदि परिवारवाद पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो इसका सीधा नुकसान संगठन को होगा। कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने सालों तक पार्टी को खड़ा करने के लिए संघर्ष किया, लेकिन अब टिकट वितरण में उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है।
“पार्टी विद द डिफरेंस” का दावा खोखला?
भाजपा की चुनावी सफलता का एक बड़ा कारण अब तक यह माना जाता रहा है कि वह अन्य दलों से अलग है और परिवारवाद से दूर रहती है। लेकिन यदि टिकट बंटवारे में वही रवैया अपनाया गया, तो भाजपा और अन्य दलों में फर्क करना मुश्किल हो जाएगा।
आज पार्टी के सामने बड़ा सवाल खड़ा है—क्या भाजपा सच में निष्ठावान कार्यकर्ताओं की पार्टी है, या फिर सत्ता की राजनीति में वह भी उसी परिवारवादी रास्ते पर चल पड़ी है, जिस पर चलने का आरोप वह वर्षों से दूसरों पर लगाती रही है?



