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Indian media credibility crisis: विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहा है हमारा मीडिया -विश्वनाथ सचदेव

Deepak dubey
Last updated: June 18, 2025 3:22 am
Deepak dubey
Published: June 18, 2025
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जो इंडिया / मुंबई: 

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पिछले कुछ दिनों से लगभग डेढ़ मिनट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। यह वीडियो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ चैनल कहने वाले एक न्यूज़ चैनल की चर्चित एंकर का है, जिसमें वे यह कहती दिखाई दे रही हैं कि अब “मैं सिर्फ सच बोलूंगी…, न कोई दलाली, न कोई चाटुकारिता।” इस वक्तव्य का सीधा-सा मतलब यह है कि पहले यह एंकर दलाली और चाटुकारिता वाली पत्रकारिता कर रही थीं। इस बारे में कुछ कहने से पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि जानकारों ने इस बात का पता लगा लिया है कि चर्चित एंकर का यह वीडियो ए. आई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी) का कमाल है। एंकर की कथित स्वीकारोक्ति भले ही कुछ को हैरान करने वाली और बहुतों को संतोष देने वाली हो, पर हकीकत यह है कि यह वीडियो “फेक” है। एंकर ने ऐसा कुछ कहा ही नहीं है। लेकिन इस घटना से यह बात तो उजागर हो ही रही है कि हमारा मीडिया आज विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहा है। आये दिन इस आशय के समाचार आते रहते हैं कि मीडिया में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया जाता है, यहां पक्षपातपूर्ण का मतलब है सत्ता के पक्ष में। यह रवैया रखने वाले मीडिया को “गोदी मीडिया” का विशेषण दिया गया है। इसका मतलब है सरकार के पक्ष में दिखाने और लिखने वाले समाचार चैनल और समाचारपत्र।

मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकारी भय और प्रलोभन का शिकार

मीडिया से यह अपेक्षा की जाती है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यवहार करेगा, ताकि दर्शक और पाठक को सही स्थितियों से अवगत रखा जाये। जनतंत्र को कमज़ोर होने से बचाने और मज़बूत बनाये रखने के लिए यह ज़रूरी है कि मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष रहे, लेकिन हमारी त्रासदी यह है कि आज हमारे मीडिया को कमज़ोर बनाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। जनतंत्र की मज़बूती की दृष्टि से यह ज़रूरी है कि संविधान का चौथा स्तंभ माना जाने वाला वीडियो ताकतवर बना रहे, निष्पक्ष और संतुलित बना रहे। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आज मीडिया की निष्पक्षता संदेह की दृष्टि से देखी जा रही है और दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकारी भय और प्रलोभन का शिकार हो रहा है। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि उसूलों की पत्रकारिता करने वाले आज सरकारी कोप का लगातार शिकार हो रहे हैं। कभी सरकारें पत्रकारों और पत्रकारिता-संस्थानों पर नकेल कसे रखने के लिए कानून की दुहाई देकर कार्रवाई करती हैं और कभी उन्हें आर्थिक दृष्टि से कमजोर बनाने की कोशिशें होती हैं।

पत्रकारिता पर यह दुहरा दबाव खुलेआम

सब जानते हैं कि अखबार या समाचार चैनल विज्ञापनों के सहारे के बिना नहीं चल सकते, और सरकारें विज्ञापन का बहुत बड़ा स्रोत हैं। वक्त की सरकार इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने की कोशिश करती है– और यह काम किसी गोपनीय तरीके से भी नहीं होता। खुलेआम धमकियां दी जाती हैं, विज्ञापन दिये जाने बंद कर दिये जाते हैं। जो मीडिया संस्थान सरकार के पक्ष में खड़े होते हैं, उन्हें सरकारी सहायता का प्रसाद मिलता रहता है, और जो सरकारी रीति-नीति पर सवाल उठाने का साहस दिखाते हैं, वे इस आर्थिक दमन के शिकार बनते हैं। मतलब यह कि जनतंत्र का पहरेदार माने जाने वाले मीडिया को स्वतंत्रता पूर्वक काम करने का अवसर ही न दिया जाना एक सामान्य बात हो गयी है। कभी पत्रकारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है और कभी आर्थिक दबाव डालकर पत्रकारिता-संस्थानों को सरकार के पक्ष में बनाये रखने की कोशिश। आज की पत्रकारिता पर यह दुहरा दबाव खुलेआम डाला जा रहा है। इसी के चलते हमारे पत्रकारिता आज विश्वसनीयता खो रही है।

देश की स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकेगी….

हमारे यहां बहुत बात होती है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की। इस अधिकार की गारंटी हमारे संविधान ने दी है। लेकिन अधिकार देना और अधिकार का उपयोग करने की अवसर देने में अंतर है। हम इस तथ्य से मुंह नहीं चुरा सकते कि प्रेस की स्वतंत्रता के संदर्भ में दुनिया के 180 देशों में हमारे भारत का स्थान 150वां हैॅ। हम इस बात पर संतोष का अनुभव कर सकते हैं कि पिछले साल हमारा स्थान 159वां था, पर हकीकत यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की दृष्टि से दुनिया के 150 देश हमसे बेहतर स्थिति में हैं। निश्चित रूप से यह स्थिति शर्मनाक ही कही जानी चाहिए। अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे पुराना जनतंत्र कहते हैं हम। और इस जनतंत्र की संभवत: सबसे महत्वपूर्ण शर्त है सवाल उठाने का अधिकार होना, इस अधिकार का उपयोग करने का समुचित अवसर होना। 150वां स्थान स्पष्ट बताता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सारे दावों के बावजूद हम इस स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं। लगभग दो साल पहले देश की मीडिया संस्थानों ने सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को एक संयुक्त पत्र भेज कर आग्रह किया था कि वे मीडिया की सिकुड़ती आज़ादी को बचाये रखने के लिए कुछ करें। ज्ञातव्य है कि यह पत्र मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया था, जिन्होंने तभी-तभी यह कहा था कि “मीडिया का यह कर्तव्य है कि वह सत्ता को सचाई से अवगत कराये, सत्ता और नागरिक दोनों को कठोर तथ्यों की जानकारी दे ताकि वे जनतंत्र को सही दिशा में ले जाने के लिए उचित निर्णय कर सकें।” मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि देश की स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकेगी जब पत्रकार यह भूमिका “बदले की कार्रवाई के खतरे के बिना निभा सकें। “

सच्ची और पूरी खबरों को जनता तक पहुंचाना पत्रकारिता का दायित्व

यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या हमारे देश में यह स्थिति है? क्या पत्रकारों को स्वतंत्रतापूर्वक, निर्भीकता से अपना काम करने का अधिकार है? और यदि अधिकार है तो क्या उन्हें इस अधिकार के उचित उपयोग का अवसर मिलता है? यह दुर्भाग्य ही है कि ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना आसान नहीं लगता। उत्तर कुल मिलाकर नकारात्मक ही है। हमने बात की शुरुआत एक टी.वी एंकर की कथित स्वीकारोक्ति से की थी। हम यह भी जानते हैं कि डेढ़ मिनट का वह वीडियो नकली है। लेकिन यह सवाल तो उठाया ही जा सकता है कि पत्रकार या न्यूज़ एंकर को अभिव्यक्ति की कितनी स्वतंत्रता मिली हुई है? पत्र या चैनल की नीति बनाना मीडिया संस्थान का काम है। वहां नौकरी करने वाले पत्रकार इस नीति के अनुसार काम करेंगे। यदि उन्हें ऐसा करना स्वीकार नहीं है तो उन्हें अपने संस्थान को भी छोड़ना होगा। कई साहसी पत्रकारों ने ऐसा किया भी है। उन्हें जनतंत्र में विश्वास करने वाले नागरिकों का समर्थन मिलना ही चाहिए। चैनल के दर्शक या समाचार पत्र के पाठक की जागरूकता ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अर्थ दे सकती है। आज आवश्यकता रीढ़ वाले पत्रकारों और जनतंत्र के मूल्य पर विश्वास करने वाले मीडिया-संस्थानों की है। जनतंत्र की रक्षा का तकाज़ा है कि मीडिया के प्रति जनता का भरोसा बना रहे। आज यदि जनतंत्र खतरे में है तो इसे इस खतरे से उबारने के लिए ईमानदार पत्रकारिता की भी आवश्यकता है। सच्ची और पूरी खबरों को जनता तक पहुंचाना पत्रकारिता का दायित्व है– यह दायित्व पूरा होना ही चाहिए।

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