ज्योति दूबे / जोइंडिया टीम लखनऊ : Justice Ravi Kumar Divakar पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ अपने कड़े फैसलों के लिए चर्चा में आए अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के एक फैसले ने न्यायपालिका पर कथित दबाव और माफिया के प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हत्या के एक मामले में 23वीं मौत की सजा सुनाते हुए जज दिवाकर ने अपने 77 पन्नों के फैसले में बेहद कड़े शब्दों में अपनी पीड़ा दर्ज की। उन्होंने कहा कि “मैं मरना पसंद करूंगा, लेकिन डरपोक जज कहलाना नहीं।”
- 97 केस हटे तो सामने आई तबादले की धमकी -Justice Ravi Kumar Divakar
- ‘डर गया तो न्यायिक सेवा से इस्तीफा देना बेहतर होगा ?’-Justice Ravi Kumar Divakar
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल ?- Justice Ravi Kumar Divakar
- जज रवि कुमार दिवाकर –
- “न्याय की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को अपराधियों के दबाव में फैसला नहीं करना चहिए, बल्कि कानून के मुताबिक न्याय देना उसका धर्म है।”
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जज दिवाकर के मुताबिक, पिछले 5 महीनों में वह हत्या के 10 मामलों में 22 दोषियों को मृत्युदंड सुना चुके थे। ताजा फैसले के बाद यह संख्या बढ़कर 23 हो गई है। उनके लगातार कठोर फैसलों के बीच 18 अगस्त को उनकी फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 से हत्या के 97 गंभीर मुकदमे प्रशासनिक आदेश के तहत वापस लेकर दूसरी अदालत में भेज दिए गए थे।
97 केस हटे तो सामने आई तबादले की धमकी -Justice Ravi Kumar Divakar
जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में दावा किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माफिया की ओर से उन्हें संदेश भिजवाया गया था कि अभी केवल मुकदमे हटाए गए हैं। यदि उन्होंने माफिया के खिलाफ कोई टिप्पणी की या उनके पीछे पड़े, तो उनकी अदालत बदलवाई जा सकती है या उनका जिले से बाहर तबादला कराया जा सकता है।
हालांकि, इस कथित धमकी की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। लेकिन किसी न्यायाधीश द्वारा अपने फैसले में इस तरह के दबाव का उल्लेख किए जाने से न्यायिक व्यवस्था की सुरक्षा और स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
‘डर गया तो न्यायिक सेवा से इस्तीफा देना बेहतर होगा ?’-Justice Ravi Kumar Divakar
जज दिवाकर ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा कि यदि वह माफिया, बाहुबलियों और अपराधियों से डर गए तो ऐसी न्यायिक सेवा में बने रहने के बजाय इस्तीफा देना बेहतर समझेंगे। उनका कहना था कि जब तक वह न्यायाधीश की कुर्सी पर हैं, तब तक फैसला लेने का अधिकार उनका है।
उनके इस बयान ने न्यायपालिका और अपराध जगत के कथित गठजोड़ को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। यदि किसी जज को अपराधियों से कथित धमकी मिलने की बात अपने फैसले में दर्ज करनी पड़े, तो न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और स्वतंत्रता को लेकर व्यवस्था कितनी मजबूत है यह भी बहस का मुद्दा बन चुका है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल ?- Justice Ravi Kumar Divakar
यह मामला सिर्फ 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने तक सीमित नहीं है। असली सवाल न्यायपालिका की स्वतंत्रता का है। अगर किसी न्यायाधीश पर मुकदमों के जरिए दबाव बनाने या अदालत बदलवाने की कथित कोशिश होती है, तो यह कानून के शासन के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकता है।
जज रवि कुमार दिवाकर –
“न्याय की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को अपराधियों के दबाव में फैसला नहीं करना चहिए, बल्कि कानून के मुताबिक न्याय देना उसका धर्म है।”
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