जो इंडिया / मुंबई: (India job crisis)
दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएँ इस समय मंदी और अस्थिरता की चपेट में हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में गिरावट, एआई का तेज़ी से बढ़ता इस्तेमाल और कंपनियों में लागत कटौती की नीतियों ने रोजगार बाजार पर बड़ा प्रहार किया है। इस वैश्विक संकट का सीधा प्रभाव भारतीय नौकरी बाजार पर भी देखा जा रहा है, जहाँ मध्यमवर्ग के सामने अभूतपूर्व चुनौती खड़ी हो गई है।
2 करोड़ भारतीयों की नौकरी पर मंडरा रहा खतरा
वित्त और अर्थशास्त्र से जुड़े विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि मौजूदा हालात नहीं सुधरे, विशेषकर अमेरिका अपने बढ़े हुए टैरिफ वापस नहीं लेता, तो क्रिसमस तक करीब 2 करोड़ भारतीयों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ सकता है।
2–5 लाख रुपये सालाना कमाने वाले लाखों कर्मचारी पहले ही छंटनी का सामना कर चुके हैं और यह संकट अब तेजी से ऊपर की आय वर्ग तक पहुँच रहा है।
आईटी, बैंकिंग, मीडिया सेक्टर में सबसे बड़ी मार
मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के संस्थापक सौरभ मुखर्जी ने एक पॉडकास्ट में बताया कि भारत में व्हाइट-कॉलर जॉब मार्केट में भारी उथल-पुथल जारी है।
उनके अनुसार—
मंदी इसका एकमात्र कारण नहीं है।
कॉर्पोरेट ऑपरेशन्स में बदलाव,
एआई आधारित ऑटोमेशन,
और वैश्विक व्यापार तनाव
इनसे नौकरी के अवसर तेजी से कम हो रहे हैं।
मुखर्जी का कहना है कि कई बड़ी भारतीय और विदेशी कंपनियाँ अब ऐसे मॉडल पर काम कर रही हैं जहाँ मनुष्यों की जगह मशीनें और एआई टूल्स ले रहे हैं।
बैंकिंग और मीडिया जैसे सेक्टर में भी एआई आधारित कामकाज अब सामान्य हो चुका है। विज्ञापन इंडस्ट्री में तो मॉडल और कैम्पेन तक एआई जनरेटेड होने लगे हैं।
भारत बनेगा गिग इकॉनमी का केंद्र
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले 2–3 साल भारत के नौकरी बाजार के लिए निर्णायक होंगे।
आईटी, बैंकिंग और मीडिया जैसे सेक्टरों में पारंपरिक सैलरी वाली नौकरियों की संख्या कम होती जाएगी और उनकी जगह गिग (मशीन/कॉन्ट्रैक्ट) जॉब्स ले लेंगी।
यह परिवर्तन—
* सिर्फ डिलीवरी या राइडशेयर तक सीमित नहीं रहेगा,
* बल्कि भारतीय कार्यबल का बड़ा हिस्सा इस नई व्यवस्था का भाग बन जाएगा।
कर्ज का बोझ बढ़ा रहा तनाव
सौरभ मुखर्जी के अनुसार भारतीय मध्यमवर्ग की स्थिति घरेलू कर्ज के कारण और खराब हो रही है।
गृहकर्ज को छोड़ दें तो, भारतीयों का निजी कर्ज उनकी आय का 33–34% है, जो दुनिया में सबसे ऊँचा स्तर माना जाता है।
इतना अधिक कर्ज आर्थिक अस्थिरता का बड़े स्तर पर संकेत देता है और नौकरी जाने की स्थिति में परिवारों को संकट में धकेल सकता है।
तुरंत कदम उठाने की जरूरत
मुखर्जी ने सरकार और उद्योग जगत से अपील की है कि रोजगार सृजन के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाए जाएँ।
यदि लाखों लोगों की नौकरियाँ गईं, तो इसका असर—
उपभोक्ता खर्च
बैंकिंग सेक्टर
घरेलू मांग
– पर गंभीर रूप से पड़ेगा और यह आर्थिक गति को लंबी अवधि के लिए धीमा कर सकता है।
