जो इंडिया/मुंबई। (Daddy’ returns home after 17 years)
गौरतलब है कि अरुण गवली को कमलाकर जामसंडेकर हत्या मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। फरवरी 2007 में बीएमसी चुनाव होने के कुछ दिन बाद ही घाटकोपर में जामसंडेकर की हत्या हुई थी और 2008 में गवली की गिरफ्तारी हुई थी। ट्रायल कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद 9 दिसंबर 2019 को गवली ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लंबी सुनवाई के बाद 28 अगस्त 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी जमानत मंजूर कर दी।
गवली की रिहाई को लेकर राजनीतिक हलकों में भी हलचल मच गई है। 2007 के बीएमसी चुनाव के बाद जेल, और अब 2025 के बीएमसी चुनाव से पहले बेल—यह संयोग चर्चाओं का विषय बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दगड़ी चाल और आसपास के क्षेत्रों में गवली के प्रभाव के कारण आगामी चुनाव में समीकरण बदल सकते हैं।
76 वर्षीय अरुण गवली ने 1980 के दशक में दाऊद इब्राहिम के साथ काम किया, लेकिन 1988 में रामा नाइक की हत्या के बाद दोनों के रिश्ते बिगड़ गए और गवली ने अपना अलग गैंग बना लिया। 1990 के दशक में मुंबई में हुए गैंगवार और पुलिस एनकाउंटर में गवली गिरोह के कई शूटर मारे गए। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालसकर ने गवली गिरोह की कमर तोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
गैंगवार और पुलिस दबाव से बचने के लिए गवली ने राजनीति का रास्ता अपनाया और अखिल भारतीय सेना (ABS) पार्टी बनाई। 2004 में वह चिंचपोकली से विधायक बने और 2009 तक विधानसभा में सक्रिय रहे। अब 17 साल बाद उनकी वापसी ने न केवल दगड़ी चाल बल्कि पूरे मुंबई की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।



