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दीपावली पर आतिशबाजी व पटाखे धर्मविरुद्ध एवं पर्यावरण के लिए नुकसानदायक: ज्योति मुणोत

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यूं तो दीपावली पर आतिशबाजी करना तथा पटाखे जलाना सबको अच्छा लगता है लेकिन क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि आतिशबाजी तथा पटाखों का हानिकारक पहलू क्या है? हम सभी आतिशबाजी से होने वाले नुकसान के विषय मे पढ़ते तथा सुनते रहे हैं और जानते भी हैं कि पटाखों का जानलेवा धुंआ वातावरण और स्वास्थ्य के लिए कितना हानिकारक है? इस जहरीले धुएँ से पर्यावरण तो दूषित होता ही है, साथ ही साथ अबोल जीवों के जीवन पर संकट भी आता है। क्या किसी ने इस विषय पर चिंतन किया कि इसका हमारे स्वास्थ्य पर कितना खतरनाक असर पड़ता है? एवं धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो क्या किसी ने यह भी सोचा कि इसका हमारी धार्मिक मान्यताओं में अहिंसा के सिद्धांत से कितना विरोधात्मक संबंध है?
सर्वप्रथम तो इस दीपावली हम यह चिंतन करें कि खुशियों के त्यौहार में हर दृष्टिकोण से हानिकारक पटाखों का क्या और कितना महत्व है और यह मानव, पशुओं सहित पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाता हैं? यह भी सोचना होगा कि हमारी इस मनमानी की कितनी बड़ी कीमत हम और हमारी आने वाली पीढ़ी को चुकाना पड़ेगा?
सबसे पहले तो हमें यह ही जानना होगा कि पटाखों का दीपावली से कोई संबंध ही नहीं है। पटाखे व आतिशबाजी पशु-पक्षियों और पर्यावरण के भी शत्रु हैं। हर दीपावली से पूर्व हमारे साधु-भगवंत, अहिंसाप्रेमी, बुद्धिजीवि, शासन व समाज के अग्रणी महानुभाव व पर्यावरण रक्षकों द्वारा समझाया जाता है कि आतिशबाजी तथा पटाखे हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। दीपावली पर आतिशबाजी तथा पटाखों के कारण सांस लेना दूभर हो जाता है तथा इनसे पैदा हुई फेफड़ों व आंखों की कई बीमारियां हमें बहुत कष्ट देती है। आतिशबाजी तथा पटाखे जलाने से उत्पन्न धुआं हमारे शरीर, फसलों, वातावरण एवं जनजीवन के लिए नुकसानदेह होता है तथा वैज्ञानिक खोज में भी विभिन्न कठिनाइयों के साथ अनेक प्रकार से बाधक बनता है।
दीपावली का संबंध हमारी धार्मिक परंपरा तथा संस्कृति से है, जो हम अपने धर्म शास्त्रों की कथाओं में पढ़ते आए हैं। जैन धर्म में कहीं भी नहीं लिखा है कि दीपावली पर पटाखे जलाना व आतिशबाजी करनी चाहिए। जैन धर्म में दीपावली के दिन भगवान महावीर को मोक्ष (निर्वाण) एवं गणधर गौतम स्वामी को परम बोधि केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी। ज्ञान ज्योति का प्रतीक है, जो स्वयं भी प्रकाशित होता है और दूसरों को भी प्रकाशवान करता है। इसी के प्रतीक स्वरूप दीपक प्राकट्य कर दीपोत्सव मनाया जाता है। हिंदू धर्म या अन्य धर्मों में भी दीपावली पर पटाखे जलाने की कोई घटना का कहीं उदाहरण नहीं है। रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है कि भगवान राम जब चौदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या नगरी लौटे तो अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। यानि हमें यह मानना होगा कि पर्व दीपावली का पटाखों व आतिशबाजी से कोई संबंध नहीं है।
आतिशबाजी करना जैन धर्म के अहिंसा सिद्धांत के भी सख्त विरुद्ध है। हम जैन धर्म की मान्यता वाले लोग तीर्थंकर भगवान महावीर के महाप्रयाण के शुभ दिन को दीपावली के महान पर्व के रूप में मनाते हैं तो फिर दीपावली के दिन ही भगवान महावीर के अहिंसा के सिद्धांत का उल्लंघन करना तो निश्चित रूप से पाप ही कहा जाएगा क्योंकि आतिशबाजी करने तथा पटाखे जलाने से लाखों जीव एक साथ मौत के मुंह में समा जाते हैं। भगवान महावीर कहते थे कि जीव मात्र को जीने का अधिकार है इसलिए उन्होंने जीवों के लिए ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया। दीपावली पर आतिशबाजी व पटाखे पाप कर्म है, जिसका उल्लेख हमारे साधु भगवंतों के व्याख्यानों में भी समय-समय पर सुनने को मिलता है। अतः सभी से निवेदन है कि पर्यावरण की रक्षा तथा धर्म की परंपरा को जीवंत रखने हेतु दीपावली पर पटाखों से परहेज करें ताकि सभी का जीवन स्वस्थ रहेगा। आइये! हम सब इस दीपावली से यह प्रण करें कि पर्यावरण के रक्षण व धर्म के अनुसरण के लिए दीपावली केवल दीपक प्रज्वलित करके मनाएंगे और आतिशबाजी तथा पटाखों से परहेज करेंगे। हम सभी दीपावली को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए आगे आकर सहयोग करें।

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लेखिका: ज्योति मुणोत (संयोजक- गोडवाड़ पर्यावरण संरक्षण समिति)

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