महाराष्ट्र में महायुति सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगातार तेज होते जा रहे हैं। ताज़ा आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि राज्य में मानवाधिकारों की स्थिति गंभीर रूप से कमजोर हुई है। महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग की 2023–24 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में आयोग में दर्ज शिकायतों की संख्या में 76.7 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसने सरकार की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2021–22 में जहां आयोग के पास 4,012 शिकायतें दर्ज थीं, वहीं 2023–24 में यह आंकड़ा बढ़कर 7,090 तक पहुंच गया। बढ़ती शिकायतें इस बात का संकेत हैं कि महायुति सरकार के कार्यकाल में आम जनता के अधिकारों की लगातार अनदेखी हो रही है और मानवाधिकारों की दुर्दशा गहराती जा रही है।
महिला शिकायतों में चौंकाने वाली बढ़ोतरी
आयोग की रिपोर्ट में सबसे गंभीर स्थिति महिलाओं से जुड़ी शिकायतों की सामने आई है। बीते तीन वित्तीय वर्षों में महिलाओं के मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों में 436 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। साल 2021–22 में जहां महिलाओं से संबंधित केवल 50 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2023–24 में इनकी संख्या बढ़कर 268 हो गई। कुल मिलाकर तीन वर्षों में महिलाओं से जुड़े 462 मामले आयोग के पास पहुंचे हैं।
इन मामलों में से आयोग ने 297 मामलों का निपटारा किया है, जबकि 165 मामले अब भी लंबित हैं। यानी निपटारे की कुल दर महज 64.29 प्रतिशत रही। हालांकि, आयोग द्वारा निपटाए गए मामलों के जरिए जरूरतमंद पीड़ितों को पिछले तीन वर्षों में कुल 1.69 करोड़ रुपये की आर्थिक राहत दी गई है।
महानगरों पर सबसे अधिक दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, 1 अप्रैल 2023 से 29 फरवरी 2024 के बीच सिर्फ 11 महीनों में ही आयोग के पास 8,200 शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें से सबसे अधिक मामले राज्य के बड़े महानगरों से सामने आए हैं। प्रशासनिक और कानूनी दबाव का केंद्र मुंबई–ठाणे–पुणे त्रिकोण बना हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई से 2,424, ठाणे से 940 और पुणे से 762 शिकायतें दर्ज की गईं।
इसके उलट राज्य के पिछड़े जिलों जैसे गड़चिरोली, हिंगोली, नंदुरबार और भंडारा से औसतन केवल 20 से 25 शिकायतें ही सामने आईं। यह असमानता न सिर्फ जागरूकता की कमी की ओर इशारा करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि दूरदराज के इलाकों में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की रिपोर्टिंग अब भी सीमित है।
कुल मिलाकर, महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग की यह रिपोर्ट महायुति सरकार के कार्यकाल में मानवाधिकारों की गिरती स्थिति का आईना दिखाती है। बढ़ती शिकायतें, महिलाओं से जुड़े मामलों में तेज उछाल और लंबित प्रकरणों की संख्या—ये सभी संकेत देते हैं कि राज्य में नागरिक अधिकारों की रक्षा को लेकर सरकार को गंभीर आत्ममंथन और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।



