जो इंडिया / जबलपुर/मध्यप्रदेश। (Madhya Pradesh High Court, abortion permission)
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में 13 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति प्रदान की है। यह अनुमति ऐसे समय में दी गई है जब पीड़िता की गर्भावस्था 28 सप्ताह से अधिक बताई गई थी, जो सामान्य कानूनी सीमा से ऊपर है। अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट, विशेषज्ञों की राय और नाबालिग की शारीरिक व मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुनाया।
मामले के अनुसार, नाबालिग के साथ दुष्कर्म की घटना सामने आने के बाद वह गर्भवती पाई गई। परिजनों को गर्भावस्था की जानकारी देर से हुई, जिसके कारण गर्भ की अवधि काफी आगे बढ़ चुकी थी। निर्धारित कानूनी सीमा पार होने के कारण स्थानीय स्तर पर गर्भपात संभव नहीं था, इसलिए परिजनों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और गर्भ समापन की अनुमति मांगी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड का गठन कर पीड़िता की स्वास्थ्य स्थिति की जांच करवाई। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि गर्भ जारी रखना नाबालिग के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में सुरक्षित तरीके से गर्भपात संभव है। इसी आधार पर अदालत ने विशेष अनुमति प्रदान की।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पीड़िता की सुरक्षा सर्वोपरि है और गर्भपात की पूरी प्रक्रिया सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में की जाएगी। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि प्रक्रिया के दौरान और उसके बाद पीड़िता को आवश्यक परामर्श (काउंसलिंग) और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाए, ताकि उसके मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जा सके।
कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत सामान्य परिस्थितियों में 20 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति है, जबकि विशेष मामलों में 24 सप्ताह तक अनुमति दी जा सकती है। 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था में गर्भपात के लिए न्यायालय की अनुमति आवश्यक होती है। इस मामले में हाईकोर्ट ने विशेष परिस्थितियों और नाबालिग की स्थिति को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाया।
यह फैसला न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने यह संदेश दिया है कि नाबालिग पीड़िताओं के मामलों में कानून को संवेदनशीलता के साथ लागू किया जाना चाहिए। महिला अधिकारों और बाल संरक्षण से जुड़े संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत किया है और इसे न्यायसंगत बताया है।
फिलहाल आरोपी के खिलाफ संबंधित धाराओं में मामला दर्ज है और पुलिस द्वारा जांच जारी है। अदालत ने राज्य सरकार को यह भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि पीड़िता और उसके परिवार की पहचान गोपनीय रखी जाए तथा उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए।
