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एचएसएनसी विश्वविद्यालय में SESTEC पर हुई संगोष्ठी

Deepak dubey
Last updated: July 14, 2024 10:32 pm
Deepak dubey
Published: July 14, 2024
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मुंबई। एचएसएनसी विश्वविद्यालय(HSNC University)मुंबई के वर्ली परिसर में 11वीं डीएई-बीआरएनएस द्विवार्षिक चार दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। 10 जुलाई 2024 से “पृथक्करण विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उभरते रुझान” (एसईएसटीईसी-2024) विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में पद्म विभूषण, पद्म भूषण और रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान के पूर्व निदेशक प्रोफेसर एम.एम. शर्मा, एचएसएनसी विश्वविद्यालय, मुंबई के प्रोवोस्ट एवं प्रख्यात उद्योगपति डॉ. निरंजन हीरानंदानी, एचएसएनसी विश्वविद्यालय, मुंबई की कुलपति और एसईएसटीईसी 2024 की सह-अध्यक्ष डॉ. हेमलता के. बागला, आरसी एंड आई समूह निदेशक, बीएआरसी और एसईएसटीईसी 2024 के चेयरपर्सन डॉ. पीके महापात्रा, एचबीएनआई मुंबई के कुलपति प्रो. यूके मुदाली, एसईएसटीईसी संयोजक डॉ. सुमित कुमार, एसईएसटीईसी की सह-संयोजक एवं के.सी. कॉलेज ऑफ आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस की प्रिंसिपल प्रोफेसर तेजश्री शानबाग एवं दुनिया भर से आए वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की विशेष उपस्थिति रही। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में पृथक्करण विज्ञान की प्रगति पर एक विशेष बुलेटिन का अनावरण किया गया। एचएसएनसी विश्वविद्यालय, मुंबई द्वारा भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई और एसोसिएशन ऑफ़ सेपरेशन साइंटिस्ट्स एंड टेक्नोलॉजिस्ट्स के सहयोग से तथा परमाणु ऊर्जा विभाग के परमाणु विज्ञान अनुसंधान बोर्ड द्वारा प्रायोजित इस संगोष्ठी में रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान के पूर्व निदेशक प्रोफेसर एम.एम. शर्मा ने पृथक्करण विज्ञान और प्रौद्योगिकी के महत्व पर प्रकाश डाला और विभिन्न क्षेत्रों जैसे कि फार्मास्यूटिकल, पेट्रोकेमिकल, पर्यावरण, पोषण और भोजन, अपशिष्ट जल उपचार, परमाणु और रेडियो रसायन विज्ञान, औद्योगिक रसायन विज्ञान, बहुलक रसायन विज्ञान, कृषि रसायन विज्ञान, कैंसर उपचार, तेल रिसाव की सफाई, खतरनाक अपशिष्ट उपचार, वायु निस्पंदन, ग्रीनहाउस गैसों का संग्रह और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्रों में इसके कई अनुप्रयोगों की व्याख्या की। प्रोफेसर शर्मा ने इस बात पर जोर देते हुए कहा, “पृथक्करण प्रक्रियाओं के महत्व का एक और संकेत इस तथ्य से मिलता है कि परंपरागत रूप से माना जाता है कि रासायनिक प्रक्रिया उद्योग (सीपीआई) संयंत्रों में उत्पादन लागत के कैपेक्स (उपकरण) और ओपेक्स (ऊर्जा आवश्यकता) का लगभग 80% हिस्सा इनका होता है, लेकिन इस पर केवल 20% ध्यान दिया जाता है।” इसी क्रम में डॉ. मोहपात्रा ने कहा कि पर्यावरण पृथक्करण विज्ञान में महत्वपूर्ण प्रगति के पीछे एक प्रेरक शक्ति उभरती हुई पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए रचनात्मक समाधानों की आवश्यकता है। अपने भाषण में, प्रो. मुदाली ने नवीनतम सफलताओं के बारे में बहुमूल्य जानकारी साझा की। संगोष्ठी में कुल 306 प्रतिभागियों ने भाग लिया। प्राप्त 276 सारांशों में से, कार्यक्रम में 177 पोस्टर प्रस्तुतियाँ, 7 पूर्ण सत्र, 22 आमंत्रित वार्ताएँ, 10 लघु व्याख्यान (एसएल) और 58 मौखिक प्रस्तुतियाँ हुईं।

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*-सतत विकास की कुंजी है पृथक्करण विज्ञान: डॉ. हीरानंदानी*
एचएसएनसी विश्वविद्यालय के प्रोवोस्ट डॉ. हीरानंदानी ने कहा कि पृथक्करण विज्ञान सतत विकास की कुंजी है और यह भारत जैसे विकासशील देश में गरीबी, असमानता को दूर करने और जीवन स्तर को बेहतर बनाने, सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने आदि में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। लगभग आधी मानवता पीने योग्य पानी की अपर्याप्त पहुंच और कृषि के लिए पानी की कमी से जूझ रही है, जिसे अब विशेष रूप से भारत के लिए एक संकट माना जाता है, रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ), इलेक्ट्रो-डायलिसिस (ईडी), नैनो-फिल्ट्रेशन (एनएफ) और अल्ट्रा-फिल्ट्रेशन (यूएफ) द्वारा जल विलवणीकरण एक व्यवहार्य समाधान के रूप में उभरा है। इसका लक्ष्य ‘शून्य निर्वहन’ है। उन्होंने कहा कि अपशिष्ट जल को उपचारित करने और इसे पुनर्चक्रित करने की इस तकनीक का उपयोग पहली बार उनकी कंपनी द्वारा पवई में अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र के रूप में 25 साल पहले किया गया था। बेहतर तकनीक के साथ, उन्नयन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उपचारित पानी का उपयोग निर्माण, अस्पतालों के विकास और फ्लशिंग आदि में किया जाता है। डॉ. हीरानंदानी ने कहा, “स्थिरता एक ऐसी चीज है जिसे हम एचएसएनसी यूनिवर्सिटी, मुंबई में आत्मसात करते हैं। हमारा उद्देश्य शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, उद्योग के साथ सहयोग और संपर्क करते हुए छात्रों को शिक्षित करना और पढ़ाना है। हमारा पूरा उद्देश्य स्थायी बुनियादी ढांचे और जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेना और अन्य संस्थानों, विश्वविद्यालयों, संगठनों आदि के साथ सहयोग करके उनसे निपटना है।”

स्थिरता के लिए ऊर्जा, अर्थशास्त्र और पर्यावरण का संतुलन जरूरी: डॉ. बागला
एचएसएनसी विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. हेमलता बागला ने पृथक्करण विज्ञान में उभरते भविष्य के रुझानों पर बात की और पानी, ऊर्जा, भोजन और जलवायु के अनुप्रयोगों पर ध्यान केंद्रित करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। महासागरों में पॉलीथीन और माइक्रो-प्लास्टिक के प्रदूषण का जिक्र करते हुए, डॉ. बागला ने प्रश्न उठाया कि, “क्या यह वह विरासत है जिसे हम अपनी भावी पीढ़ियों के लिए छोड़ना चाहते हैं?” इस पर विस्तार से बताते हुए, उन्होंने आगे कहा, “ऊर्जा, अर्थशास्त्र और पर्यावरण बहुत निकटता से जुड़े हुए हैं, लेकिन वर्तमान में केवल अर्थशास्त्र ही सुर्खियों में है क्योंकि ध्यान वाणिज्य पर है। स्थिरता के लिए सभी तीन ई को संतुलित करने की आवश्यकता है।” उन्होंने माना कि वैज्ञानिकों के लिए चुनौतियां कभी खत्म नहीं होतीं, लेकिन उन्होंने कहा कि “वैज्ञानिकों के रूप में, हमें अपने ऊर्जा पदचिह्न को कम करने पर ध्यान केंद्रित करके टिकाऊ प्रक्रियाओं का लक्ष्य रखना चाहिए और पुन: उपयोग, रीसाइकिल पर ध्यान देते हुए तीन आर को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।”

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