जो इंडिया / मुंबई: (Electricity Bill Increase) देशभर के बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाला समय जेब पर भारी पड़ सकता है। केंद्र सरकार की नई राष्ट्रीय विद्युत नीति (NEP) का मसौदा सामने आने के बाद संकेत साफ हैं कि वित्त वर्ष 2026-27 से बिजली का बिल हर साल ही नहीं, बल्कि हर महीने ऑटोमैटिक तरीके से बढ़ सकता है। यह बढ़ोतरी किसी अलग आदेश के बिना, तय फॉर्मूले के तहत लागू होगी।
joindia report on Electricity Bill Increase: नई नीति के मुताबिक, अगर राज्य विद्युत नियामक आयोग समय पर टैरिफ तय नहीं करते हैं, तो इंडेक्स-लिंक्ड टैरिफ सिस्टम के आधार पर बिजली की दरें अपने आप बढ़ जाएंगी। अब तक राजनीतिक कारणों से कई राज्यों में बिजली की दरें वर्षों तक स्थिर रहती थीं, लेकिन इस व्यवस्था से उस पर ब्रेक लग जाएगा।
Electricity Bill Increase: बजट सत्र में आ सकता है संशोधन विधेयक
सूत्रों के अनुसार, बिजली (संशोधन) विधेयक को संसद के आगामी बजट सत्र में पेश किए जाने की संभावना है। इस विधेयक में बिजली क्षेत्र में दी जा रही सब्सिडी को धीरे-धीरे कम करने का प्रस्ताव भी शामिल है। इसका सीधा असर आम और मध्यम वर्गीय उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
Electricity Bill Increase: आम उपभोक्ता पर सबसे ज्यादा असर
नई नीति का सबसे बड़ा असर घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं पर पड़ने की आशंका है। आंकड़ों के अनुसार, देश की करीब 45 फीसदी बिजली खपत इन्हीं वर्गों की है। फिलहाल बिजली सप्लाई की औसत लागत करीब 6.8 रुपये प्रति यूनिट है, जबकि कई राज्यों में उपभोक्ताओं से इससे कम वसूली होती है।
नई व्यवस्था लागू होने पर लागत और वसूली के इस अंतर को धीरे-धीरे खत्म किया जाएगा, यानी बिजली सस्ती रहने की उम्मीद अब कम होती जाएगी।
Electricity Bill Increase: हर महीने बदल सकता है बिल
मसौदा नीति में यह भी साफ किया गया है कि अगर बिजली खरीद की लागत में महीने-दर-महीने उतार-चढ़ाव होता है, तो उसका सीधा असर उपभोक्ताओं के बिल पर डाला जा सकता है। यानी अब बिजली का बिल सिर्फ साल में एक बार नहीं, बल्कि हर महीने बदल सकता है।
खरीद लागत का पूरा हिसाब उपभोक्ताओं को नीति में कहा गया है कि बिजली वितरण कंपनियों को बिजली खरीद की लागत में होने वाले बदलाव की पूरी जानकारी हर महीने उपभोक्ताओं को देनी होगी। साथ ही, लागत में उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए स्थिरीकरण कोष (Stabilization Fund) बनाने की भी सिफारिश की गई है। बावजूद इसके, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बिल कम होने के बजाय और ज्यादा बढ़ सकते हैं
पूरी लागत उसी साल वसूली जाएगी
ड्राफ्ट पॉलिसी के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 से नियामक आयोगों को ऐसी दरें तय करनी होंगी, जिससे बिजली उत्पादन और वितरण की पूरी लागत उसी समय वसूल की जा सके। अब घाटे को बाद के वर्षों में समायोजित करने की व्यवस्था खत्म की जाएगी। इसके अलावा, बिजली की कीमतों को महंगाई दर जैसे सूचकांकों से जोड़ने का भी प्रस्ताव है।
कंपनियों की हालत सुधरी, उपभोक्ता पर बोझ
गौर करने वाली बात यह है कि करीब 10 साल बाद, वित्त वर्ष 2025 में बिजली कंपनियों ने लगभग 2,700 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया है। पहले जहां कंपनियों को हर यूनिट पर 48 पैसे का घाटा होता था, वह अब घटकर सिर्फ 6 पैसे रह गया है। यानी कंपनियों की सेहत सुधर रही है, लेकिन इसका बोझ अब उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने वाला है।
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