जो इंडिया / मुंबई: (NOTA votes in Mumbai)
मुंबई महानगरपालिका (मनपा) चुनाव में इस बार मतदाताओं का एक अलग ही रुख देखने को मिला। जहां एक ओर कई इलाकों में उत्साहपूर्ण मतदान दर्ज किया गया, वहीं दूसरी ओर एक लाख से अधिक मुंबईवासियों ने ‘नोटा’ (None of the Above) का विकल्प चुनकर राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के प्रति अपनी असंतुष्टि खुलकर जाहिर की।
चुनाव आयोग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, मनपा चुनाव में कुल 54 लाख से अधिक वोट डाले गए, जिनमें से 1,00,327 मत नोटा के खाते में गए। यह संख्या कुल मतों का 1.83 प्रतिशत है, जो शहरी चुनावों के लिहाज से एक अहम संकेत मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़ा बताता है कि मतदाता मतदान से दूर नहीं हो रहे हैं, बल्कि विकल्पों की गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे हैं।
पश्चिमी उपनगरों में नोटा का प्रभाव सबसे अधिक
इस चुनाव में पश्चिमी उपनगरों ने नोटा के मामले में सबसे ऊपर स्थान हासिल किया। दहिसर से बांद्रा तक के इलाकों में 47,936 मतदाताओं ने नोटा बटन दबाया, जो उस क्षेत्र में डाले गए कुल मतों का लगभग 1.9 प्रतिशत है। दिलचस्प बात यह है कि यही क्षेत्र मतदान प्रतिशत के मामले में भी शहर में अग्रणी रहा।
बोरीवली के वार्ड 18 में 62.04 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जबकि दहिसर के वार्ड 4 में 60.67 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। भारी मतदान के बावजूद बड़ी संख्या में नोटा वोट पड़ना इस बात का संकेत है कि मतदाता जागरूक तो हैं, लेकिन कई उम्मीदवारों से संतुष्ट नहीं हैं।
क्या कहता है नोटा का बढ़ता आंकड़ा?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नोटा का बढ़ता चलन यह दर्शाता है कि मतदाता अब केवल पार्टी के नाम पर वोट देने को तैयार नहीं हैं। वे विकास, पारदर्शिता, स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की छवि को अधिक महत्व दे रहे हैं। कई सामाजिक संगठनों का भी कहना है कि नोटा वोट राजनीतिक दलों के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
नोटा कब और क्यों लागू हुआ?
गौरतलब है कि सितंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद भारत निर्वाचन आयोग ने नोटा का विकल्प शुरू किया था। इसके तहत 11 अक्टूबर 2013 से ईवीएम में नोटा बटन उपलब्ध कराया गया। नोटा का उद्देश्य उन मतदाताओं को अधिकार देना है, जो किसी भी उम्मीदवार को योग्य नहीं मानते, ताकि वे अपनी असहमति को गोपनीयता बनाए रखते हुए दर्ज करा सकें।
लोकतंत्र के लिए संदेश
मुंबई मनपा चुनाव में नोटा को मिले एक लाख से अधिक वोट यह स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि लोकतंत्र में मतदाता केवल संख्या नहीं, बल्कि सोचने-समझने वाली शक्ति है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि राजनीतिक दल इस संकेत को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या वे उम्मीदवार चयन व नीतियों में बदलाव करते हैं या नहीं।



