जो इंडिया / मुंबई : (Medical negligence in Mumbai Municipal Corporation hospital)
भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाने वाला मामला सामने आया है। शताब्दी अस्पताल (कांदिवली) में एक एचआईवी पॉजिटिव मरीज को केवल उसके संक्रमण की स्थिति के कारण आपातकालीन सर्जरी से वंचित कर दिया गया। डॉक्टरों ने न सिर्फ चिकित्सा नैतिकता की सीमाएं लांघीं, बल्कि मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक भटकने पर मजबूर कर दिया। अंततः नायर अस्पताल ने उस मरीज को जीवनदान दिया।
मरीज को मिला “एचआईवी पॉजिटिव” का ठप्पा
31 अक्टूबर 2025 को सागिर सईद नामक एक गरीब मरीज पेट में तेज दर्द की शिकायत के साथ शताब्दी अस्पताल में भर्ती हुआ। जांच में पता चला कि उसे एक्यूट अपेंडिसाइटिस है — जो कि एक सामान्य और तत्काल की जाने वाली सर्जरी है। लेकिन जैसे ही रिपोर्ट में एचआईवी पॉजिटिव आने की जानकारी मिली, डॉक्टरों ने सर्जरी करने से मना कर दिया।
डॉ. राजेश मोरे और डॉ. तुषार वालावी की टीम ने मरीज को बिना इलाज के डिस्चार्ज कर दिया। यह तब हुआ जब भारत में हर स्तर के अस्पतालों में ऐसी सर्जरी नियमित रूप से की जाती है, चाहे मरीज एचआईवी पॉजिटिव हो या नहीं।
कूपर अस्पताल ने खारिज किया अवैध रेफरल
शताब्दी अस्पताल ने मरीज को कूपर अस्पताल रेफर कर दिया। लेकिन कूपर अस्पताल के सर्जरी विभाग ने इस रेफरल को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि “एचआईवी पॉजिटिव होना सर्जरी के लिए कोई चिकित्सा बाधा नहीं है।”
इसके बावजूद, शताब्दी अस्पताल ने मरीज का इलाज करने से साफ इनकार कर दिया — यह निर्णय न केवल अमानवीय था, बल्कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के दिशा-निर्देशों का भी उल्लंघन था।
ऑपरेशन थिएटर में ले जाकर बाहर भेजा गया
मरीज सागिर सईद ने कहा,
> “मुझे पहले ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया, लेकिन जब रिपोर्ट में एचआईवी पॉजिटिव निकला तो डॉक्टरों ने कहा कि सर्जरी नहीं होगी। मुझे अस्पताल से निकाल दिया गया। इसके बाद मैं शताब्दी और कूपर अस्पतालों के बीच चक्कर काटता रहा। आखिरकार मुझे नायर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां मेरा इलाज चल रहा है।”
सिस्टम की पोल खोलती कहानी
यह मामला सिर्फ एक मरीज की त्रासदी नहीं, बल्कि मुंबई की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में फैले चिकित्सकीय भेदभाव और व्यवस्थागत भ्रष्टाचार की पोल खोलता है।
सूत्रों के अनुसार, अस्पताल में DNB शिक्षकों का निजी प्रैक्टिस में लिप्त रहना, वरिष्ठ डॉक्टरों की अनुपस्थिति, और प्लास्टिक सर्जन को सर्जरी विभाग में पदस्थापित करना जैसी गड़बड़ियां पहले से चल रही हैं।
मानवाधिकारों का उल्लंघन
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति के साथ ऐसा भेदभाव मानवाधिकार हनन की श्रेणी में आता है। कानूनन, हर नागरिक को समान चिकित्सा सुविधा का अधिकार है। किसी मरीज को उसके स्वास्थ्य की स्थिति के आधार पर इलाज से वंचित करना अपराध माना जाता है।
सरकारी जांच की मांग
यह मामला सामने आने के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मेडिकल फ्रैटर्निटी ने महाराष्ट्र सरकार और मुंबई महानगरपालिका से इस घटना की जांच की मांग की है।
सवाल यह है कि क्या “धरती के भगवान” कहे जाने वाले डॉक्टर इंसानियत की कसौटी पर खरे उतर पाएंगे?



