जो इंडिया / नई दिल्ली / मुंबई: (Israel – Iran Conflict) मध्य पूर्व एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। दशकों तक परदे के पीछे चलने वाला इज़राइल–ईरान संघर्ष अब खुली सैन्य कार्रवाई में बदल चुका है। ड्रोन, मिसाइल और हवाई हमलों ने इस टकराव को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। सवाल यह है कि जो देश कभी मित्र थे, वे आज एक-दूसरे के अस्तित्व के दुश्मन कैसे बन गए? इस संघर्ष की जड़ें केवल धर्म या राजनीति में नहीं, बल्कि इतिहास, क्षेत्रीय प्रभुत्व और परमाणु शक्ति की होड़ में छिपी हैं।
इज़राइल–ईरान संबंधों की शुरुआत: जब दोस्त थे दोनों देश (1948–1979)- (Israel – Iran Conflict)
1948 में इज़राइल की स्थापना के बाद, ईरान उन गिने-चुने मुस्लिम देशों में शामिल था जिसने इज़राइल का खुलकर विरोध नहीं किया। शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासनकाल में ईरान और इज़राइल के रिश्ते रणनीतिक साझेदारी तक पहुंच गए थे।
ईरान इज़राइल को तेल की आपूर्ति करता था
इज़राइल ईरान को कृषि, सुरक्षा और खुफिया तकनीक में मदद देता था दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग भी था उस दौर में ईरान, इज़राइल को अरब देशों के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ एक अहम साझेदार मानता था।
1979 की इस्लामी क्रांति: रिश्तों में आई ऐतिहासिक दरार – (Israel – Iran Conflict read on joindia.co.in )
1979 में अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई और शाह का तख्तापलट हो गया। यही वह मोड़ था, जिसने इज़राइल–ईरान संबंधों की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।
ईरान ने इज़राइल को “अवैध राज्य” घोषित किया
सभी राजनयिक और व्यापारिक संबंध समाप्त कर दिए गए
फिलिस्तीन समर्थन को ईरान की विदेश नीति का केंद्र बनाया गया
इसके बाद ईरान ने लेबनान के हिज़्बुल्लाह और गाज़ा के हमास जैसे संगठनों को समर्थन देना शुरू किया, जिन्हें इज़राइल अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है।
परमाणु कार्यक्रम: संघर्ष को और खतरनाक बनाने वाला अध्याय –
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21वीं सदी की शुरुआत में ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने इस दुश्मनी को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। इज़राइल का आरोप है कि ईरान शांतिपूर्ण ऊर्जा के बहाने परमाणु बम बनाने की कोशिश कर रहा है।
इज़राइल ने ईरान को “अस्तित्वगत खतरा” बताया
ईरानी परमाणु ठिकानों पर साइबर हमले किए गए
कई ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों की रहस्यमयी हत्याएं हुईं
ईरान लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है, लेकिन अविश्वास की खाई और गहरी होती चली गई।
छाया युद्ध से खुली जंग तक (2020 के बाद)
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पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष संघर्ष अब सीधे टकराव में बदलने लगा।
2020: ईरान के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मोहसेन फखरीज़ादेह की हत्या
2021–22: सीरिया और लेबनान में ईरान समर्थित ठिकानों पर इज़राइली हमले
2023–24: गाज़ा युद्ध के बाद ईरान की खुली चेतावनियां
अप्रैल 2024: ईरान द्वारा इज़राइल पर ड्रोन और मिसाइल हमला — ऐतिहासिक मोड़
यह पहली बार था जब ईरान ने सीधे इज़राइली क्षेत्र को निशाना बनाया।
मध्य पूर्व में ‘भूकंप’ के पीछे असली कारण क्या हैं?
1. क्षेत्रीय प्रभुत्व की लड़ाई
ईरान सीरिया, इराक, लेबनान और यमन में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, जिसे इज़राइल अपने चारों ओर “खतरे की घेराबंदी” मानता है।
2. परमाणु हथियारों का डर
इज़राइल के लिए परमाणु शक्ति संपन्न ईरान उसके अस्तित्व पर सीधा खतरा है।
3. धर्म और विचारधारा
शिया इस्लामी ईरान और यहूदी राष्ट्र इज़राइल के बीच वैचारिक टकराव इस संघर्ष को और जटिल बनाता है।
क्या वास्तव में युद्ध शुरू हो चुका है?
अब तक गुप्त हमलों और प्रतिनिधि संगठनों के जरिए लड़ी जा रही यह लड़ाई खुली जंग का रूप लेती दिख रही है। हवाई हमलों, ड्रोन अटैकों और मिसाइल स्ट्राइक्स ने यह साफ कर दिया है कि यह सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं रही।
अमेरिका की भूमिका, सऊदी अरब और यूएई की रणनीति, और ईरान की आंतरिक राजनीति — ये सभी कारक इस युद्ध के भविष्य को तय करेंगे।
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