बीएमसी चुनावों की घोषणा के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में सियासी बयानबाज़ी तेज हो गई है। शरद गुट के NCP विधायक रोहित पवार (Rohit Pawar)
खरंतर निवडणूक आयोग कुणासाठी थांबत नसतो ती एक स्वायत्त संस्था आहे. मात्र काल दिवसभराचा घटनाक्रम पाहता निवडणूक आयोग कशाची तरी वाट पाहत असल्याचे जाणवले. काल सत्ताधारी नेत्यांनी अनेक उद्घाटने केली मतदारांना प्रभावित करण्यासाठी अनेक नवीन घोषणा केल्या आणि हे सर्व झाल्या नंतर निवडणूक…
— Rohit Pawar (@RRPSpeaks) December 16, 2025
रोहित पवार ने अपने पोस्ट में लिखा कि आमतौर पर चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था माना जाता है, जो किसी व्यक्ति या सरकार का इंतज़ार नहीं करती। लेकिन बीएमसी चुनावों की घोषणा से ठीक पहले हुई घटनाओं ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि चुनावों की घोषणा से पहले पूरे दिन सत्ताधारी नेताओं द्वारा उद्घाटन कार्यक्रम किए गए, मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नई-नई घोषणाएं की गईं और इसके बाद ही चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनावों का ऐलान किया।
एनसीपी नेता ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए कहा कि इन घटनाओं से यह साफ झलकता है कि कौन किसके इशारे पर काम कर रहा है और किसकी सुनी जा रही है। रोहित पवार ने सवाल उठाया कि यदि चुनाव आयोग पूरी तरह स्वतंत्र है, तो फिर चुनावों की घोषणा का समय इस तरह तय क्यों किया गया, जिससे सत्ताधारी दलों को राजनीतिक लाभ मिल सके।
अपने बयान में उन्होंने लोकतंत्र के भविष्य को लेकर भी गहरी चिंता जताई। रोहित पवार ने लिखा कि जब लोकतंत्र का इस तरह गला घोंटा जा रहा हो, तब विपक्ष का दायित्व बनता है कि वह हर संभव कदम उठाकर उसे बचाने की लड़ाई लड़े। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही विपक्ष लगातार लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा हो, लेकिन आम नागरिकों के मन में यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है कि क्या इस तरह की कथित तानाशाही परिस्थितियों में लोकतंत्र सचमुच सुरक्षित रह पाएगा।
रोहित पवार के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सत्ताधारी दलों की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी तकरार और तेज हो सकती है। बीएमसी चुनावों के ऐलान के साथ ही जहां चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, वहीं चुनाव आयोग की निष्पक्षता और लोकतंत्र की स्थिति को लेकर छिड़ी यह बहस अब महाराष्ट्र की राजनीति का एक अहम मुद्दा बनती नजर आ रही है।



