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महाराष्ट्र में बिजली दरों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक तापमान बढ़ गया है। जहां एक ओर राज्य सरकार ने पहले बिजली सस्ती करने का वादा किया था, वहीं अब बिजली दरों में संभावित बढ़ोतरी के प्रस्ताव ने विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का मौका दे दिया है। महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी (महा वितरण) द्वारा महाराष्ट्र विद्युत नियामक आयोग (मर्क) के समक्ष 20 से 40 प्रतिशत तक बिजली दर वृद्धि का प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद कांग्रेस ने इसे जनता के साथ “धोखा” करार दिया है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पूर्व में घोषणा की थी कि आगामी पांच वर्षों में बिजली दरों में कुल 50 प्रतिशत की कमी की जाएगी तथा पहले वर्ष में ही 10 प्रतिशत की राहत दी जाएगी। लेकिन वर्तमान स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है। सूत्रों के अनुसार, मर्क के समक्ष इस प्रस्ताव पर सुनवाई भी पूरी हो चुकी है और आयोग के निर्णय के बाद 10 से 20 प्रतिशत तक बिजली दरों में बढ़ोतरी संभव है।
कांग्रेस का आरोप: उद्योगपतियों को लाभ, जनता पर भार
कांग्रेस के प्रवक्ता अतुल लोंढे ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह दर वृद्धि कुछ बड़े उद्योग समूहों को लाभ पहुंचाने की दिशा में उठाया गया कदम है। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस विषय पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण की मांग की है। लोंढे ने कहा कि भाजपा सरकार की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है। चुनावों के दौरान किसानों की कर्जमाफी और बिजली दरों में कटौती के वादे किए गए थे, लेकिन अब आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।
उद्योग और मध्यम वर्ग पर असर
यदि प्रस्तावित दर वृद्धि लागू होती है, तो इसका सीधा असर घरेलू उपभोक्ताओं के साथ-साथ छोटे, मध्यम और लघु उद्योगों पर पड़ेगा। पहले से ही महंगाई, ईंधन की कीमतों और बेरोजगारी की मार झेल रही जनता के लिए यह एक और झटका साबित हो सकता है। व्यापारिक संगठनों का कहना है कि बिजली दरों में बढ़ोतरी से उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिसका प्रभाव वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई देगा।
पड़ोसी राज्यों से तुलना
विपक्ष ने पड़ोसी राज्यों की बिजली दरों का हवाला देते हुए महाराष्ट्र में दरों को अधिक बताया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, गुजरात में घरेलू बिजली दर 3.0 से 5.2 रुपये प्रति यूनिट, कर्नाटक में 3.7 से 7.3 रुपये प्रति यूनिट तथा तेलंगाना में 2 से 10 रुपये प्रति यूनिट के बीच है। वहीं महाराष्ट्र में यह दर 4.4 से 12.8 रुपये प्रति यूनिट तक बताई जा रही है। विपक्ष का सवाल है कि जब उत्पादन लागत लगभग समान है तो महाराष्ट्र में दरें अधिक क्यों हैं?
सरकार का संभावित पक्ष
ऊर्जा विभाग के सूत्रों का कहना है कि बिजली वितरण कंपनियों पर बढ़ते घाटे, ईंधन समायोजन शुल्क, बकाया सब्सिडी और बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण के कारण दर संशोधन आवश्यक हो सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय मर्क द्वारा सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही लिया जाएगा।
