जोइंडिया टीम/ मुंबई: मुंबई महानगरपालिका चुनाव 2026 (BMC Election 2026) की जंग जैसे-जैसे तेज होती जा रही है, वैसे-वैसे महायुति के भीतर सीट बंटवारे (Mahayuti seat sharing) को लेकर असंतोष और आरोप-प्रत्यारोप भी खुलकर सामने आने लगे हैं। इसी सियासी उथल-पुथल के बीच केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के प्रमुख रामदास अठावले (Ramdas Athawale) की भूमिका राजनीतिक गलियारों में चर्चा का बड़ा विषय बन गई है।
महायुति में शामिल शिवसेना और बीजेपी (BJP) द्वारा सीट बंटवारे के दौरान RPI को लगभग नजरअंदाज किए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि गठबंधन में रहते हुए भी RPI के लिए किसी भी स्तर पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। मुंबई में RPI द्वारा अपने दम पर 13 उम्मीदवार मैदान में उतारे जाने के बावजूद, महायुति की प्रचार सभाओं में रामदास अठावले की मौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
📍Mumbai | महायुतीचा पदाधिकारी मेळावा | #mahayuti #ramdasathawale #eknathshinde #devendrafadnavis pic.twitter.com/8v6rrnPI49
— Ramdas Athawale (@RamdasAthawale) January 3, 2026
RPI नेताओं का खुला आरोप है कि बीजेपी ने उन्हें एक भी सीट देने से इनकार कर दिया, जबकि शिवसेना की ओर से भी अपने आधिकारिक चुनाव चिन्ह पर महज एक सीट देने का संकेत दिया गया है। इसे लेकर अठावले गुट में गहरी नाराजगी बताई जा रही है। पार्टी का मानना है कि यह सीट बंटवारा महायुति में उनके साथ किए गए बड़े राजनीतिक धोखे का उदाहरण है।
दिलचस्प स्थिति यह है कि एक ओर RPI के 13 से 14 उम्मीदवार मुंबई के अलग-अलग वार्डों में अकेले चुनावी मैदान में उतर चुके हैं, वहीं दूसरी ओर खुद रामदास अठावले महायुति की प्रचार रैलियों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते नजर आ रहे हैं। इस दोहरी रणनीति ने राजनीतिक विश्लेषकों और कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है।
सूत्रों के अनुसार, भले ही अठावले गुट अपनी सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ रहा हो, लेकिन वे महायुति के उम्मीदवारों के समर्थन में भी प्रचार करेंगे। यानी चुनावी मैदान में मुकाबला भी और मंच पर समर्थन भी—यही वजह है कि रामदास अठावले की भूमिका को इस चुनाव में “सरप्राइजिंग” और “रणनीतिक” माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अठावले की यह भूमिका केवल सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में महायुति के भीतर समीकरणों और समीपताओं को भी प्रभावित कर सकती है। BMC चुनाव में जहां एक तरफ महायुति की एकजुटता पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रामदास अठावले का यह संतुलन साधने वाला रुख मुंबई की सियासत में नए समीकरण गढ़ सकता है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव नतीजों के बाद यह रणनीति अठावले और उनकी पार्टी के लिए फायदेमंद साबित होती है या महायुति के भीतर बढ़ता असंतोष किसी बड़े राजनीतिक मोड़ की ओर इशारा करता है।



