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Parents should stop giving ‘this’ food in tiffin to their children:पेरेंट्स बच्चों को टिफिन में ‘यह’ खाना देना करें बंद !

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बढ़ रही लीवर की गंभीर बीमारी डॉक्टर द्वारा दिए गए निर्देश

भारत में पिछले कुछ सालों से नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर की समस्या बढ़ती जा रही है। इस बीमारी में लिवर पर अतिरिक्त चर्बी जमा हो जाती है, जिससे कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। एम्स के एक हालिया अध्ययन में गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग के संबंध में एक चौंकाने वाला निष्कर्ष सामने आया है। परिणामस्वरूप, (Parents should stop giving ‘this’ food in tiffin to their children

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)भारत में एक तिहाई (38 प्रतिशत) भारतीय फैटी लीवर या गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग से पीड़ित हैं। चिंता की बात यह है कि यह समस्या सिर्फ वयस्कों तक ही सीमित नहीं है बल्कि करीब 35 फीसदी बच्चों को इसका खतरा है। इसके चलते एनसीआर (पैन मेट्रो) में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, हेपेटोलॉजी, जीआई सर्जरी और लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन संस्थान के अध्यक्ष डॉ. हर्ष कपूर ने माता-पिता से आग्रह किया है कि वे अपने बच्चों को टिफिन देते समय सावधानी बरतें।

क्योंकि कई माता-पिता अपने बच्चों को दुकानों से तैयार खाद्य पदार्थ, मसालेदार भोजन, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और विशेष रूप से कार्बोहाइड्रेट-भारी खाद्य पदार्थ टिफिन में खिलाते हैं। इससे बच्चों के स्वास्थ्य, खासकर लीवर पर गंभीर असर पड़ रहा है। इस वजह से माता-पिता के लिए जरूरी है कि वे अपने बच्चों को घर का बना खाना दें। इस संबंध में जून 2022 में जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल हेपेटोलॉजी में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी।

गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग (एनएएफएलडी) के लक्षण अक्सर पहचान में नहीं आते हैं। शुरुआती दौर में कोई लक्षण नजर नहीं आते। लेकिन, यह समस्या उन मरीजों में बढ़ जाएगी जो लिवर संबंधी गंभीर बीमारियों का सामना कर रहे हैं। इसके लिए शीघ्र उपचार की आवश्यकता होती है। गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग के चार मुख्य कारण हैं। अनियंत्रित मधुमेह, डिस्लिपिडेमिया या खराब कोलेस्ट्रॉल, मोटापा (जब आपका वजन आपके बॉडी मास इंडेक्स या बीएमआई के 10 प्रतिशत से अधिक हो), और एक गतिहीन जीवन शैली। इनमें व्यायाम की कमी, ख़राब आहार, तले हुए या प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मिठाइयाँ और मांसाहारी भोजन शामिल हैं।

युवा लोगों में गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग के क्या कारण हैं?
कोरोना के बाद कई लोगों की जीवनशैली में बड़े बदलाव देखने को मिले, इसमें युवा पीढ़ी की जीवनशैली कई मायनों में बदल गई। खान-पान की आदतों में बदलाव आ रहे हैं। इससे उच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ जाता है और शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है। इससे वजन बढ़ना, मोटापा और पाचन संबंधी विकार होते हैं। इन सभी कारणों से युवाओं में नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज की समस्या बढ़ रही है।

1) पश्चिमी भोजन
भारत में अधिकतर युवा पीढ़ी पश्चिमी खाना शौक से खा रही है। इसमें अधिक परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट, संतृप्त वसा और शर्करा युक्त पेय का सेवन शामिल है। ये पदार्थ चयापचय संबंधी गड़बड़ी और यकृत में वसा के संचय का कारण बनते हैं
घटनाएँ बढ़ रही हैं, साथ ही गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग का खतरा भी बढ़ रहा है। यह बढ़ी हुई वसा हेपेटोसाइट्स को नष्ट कर देती है और लीवर के ऊतकों को नुकसान पहुंचाती है। यह बीमारी बहुत धीरे-धीरे विकसित होती है, इसलिए इसका असर युवावस्था में नहीं, बल्कि वयस्कता में महसूस होता है। इससे लिवर में जटिलताएं पैदा होती हैं।

20 या 30 वर्ष की आयु में गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग से पीड़ित व्यक्ति के जीवित रहने की बेहतर संभावना होती है। लेकिन, समय रहते इसके लक्षणों को पहचानना जरूरी है। इसके लिए माता-पिता को भी अपने बच्चों को टिफिन में बाहरी प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, तले हुए, मीठे खाद्य पदार्थ देने से बचना चाहिए।

2) मोटापा
भारत में मोटापा एक चिंता का विषय बनता जा रहा है। यह बीमारी युवाओं समेत हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर रही है। शरीर के अतिरिक्त वजन और मोटापे का गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग से गहरा संबंध है, क्योंकि वे इंसुलिन प्रतिरोध और लीवर में वसा जमा होने का कारण बनते हैं। खराब खान-पान और नियमित व्यायाम की कमी मोटापे का कारण है।

3) इंसुलिन प्रतिरोध और मधुमेह
भारत में टाइप 2 मधुमेह का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है और इंसुलिन प्रतिरोध मधुमेह का पूर्वसूचक है। इंसुलिन प्रतिरोध शरीर की रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने की क्षमता को कम कर देता है, जिससे फैटी लीवर का खतरा बढ़ जाता है। जैसे-जैसे अधिक युवा लोगों में इंसुलिन प्रतिरोध और मधुमेह विकसित हो रहा है, उनमें गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग का प्रसार भी बढ़ रहा है।

4)आनुवंशिक रोग
गैर-अल्कोहलिक फैटी लीवर रोग के विकास में आनुवंशिक कारक भी भूमिका निभाते हैं। कुछ बच्चों में गैर-अल्कोहल फैटी एसिड

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